Friday, October 16, 2009

आओ जला ले एक लौ मोहब्बत की,

Hello friends!

It's not feasible to wish all of you on your blog. Thus I applied short cut . Hope you guys will understand my plight. I'm in hurry........ so chalte- chalte



"आओ जला ले एक लौ मोहब्बत की,
बिना मलतब का प्यारा रिश्ता बना ले कोई ,
नफरत, शिकवे, कड़वाहटे जल जाये शायद,
हादसे इस दिवाली टल जाये शायद "

See you Soon,

with warm regards,

Priya

Sunday, September 27, 2009

मुक्तक





१.


इस दिल ने जो भी चाहा वो कभी ये कह नहीं पाया,
परिणामो से इतना डरा कि ये जोखिम ले नहीं पाया,
कमी खलती है जीवन में उन हसरतों की मुझको
जो बीजो में तो है लेकिन अंकुरित हो नहीं पाया॥

२.



बसंती रूप-रंग धर कर फिजा मेरे घर आई थी,
मेरी चौखट पे आकर के जोर से आवाज़ लगाईं थी,
मै बहुत तेज से दौडी और फिर ठिठक सी गई
एक झोंके की बेवफाई अचानक याद आई थी॥

३.



तुम तो खेल रहे थे हमसे पर हम थे संजीदा से,
तुमको लेकर देख रहे थे सपने कुछ पसंदीदा से,
पलकों के घूंघट तक तो सपना था बहुत सुहाना सा,
सिन्दूरी सुबह के आते तुमको जाने का मिला बहाना सा॥

४ .


शिकायत नहीं है मुझको तुमसे तकदीर ही मुझसे रूठी है,
अब तो ख्वाबो, ख्यालों की दुनिया लगती मुझको झूठी है,
जानते हैं यहाँ सब कि सपनो से मेरी लडाई है,
सपनो से जुदाई मान भी लूं पर तेरा होना सच्चाई है॥

५ .


कदम न आगे बढे न पीछे हटे,
हम दोनों जहाँ थे वही पे रहे,
वक़्त चलता गया रुका ही नहीं,
अब तुम हो कहीं और हम है कहीं ॥

६ .


मन में जो अमिट कहानी थी, तुमने वो कब जानी थी,
ह्रदय में अनकही गाथाये थी लबो पे उतर न पाई थी,
गुरुरे मद में चूर मेरा झूठ तो देखिये साहेब,
कहीं मै रो न दू इस वास्ते तेरे जाने की महफ़िल सजायी थी॥

७ .



हवाओं सुना ज़रा ठहरो मेरी ताल से ताल मिलाओं,
दरियाओं के संगम को साहिल पे ला के दिखलाओ,
क्यों न नाज़ हो खुद पर सुनो ए आसमां वालो,
बिना छल के समंदर मथ हलाहल पी के दिखलाओ॥

८ .



इन किताबों से मुझे दोस्ती करने दो,
जुनू शायरियों का कुछ कम ही रहने दो,
ठाहको के बाज़ारों में ये बेमोल बिकती हैं
पर सच है इन्ही के कारण महफिले सजती हैं॥


९ .


"नहीं है वादा कोई के हमेशा साथ निभाएगे,
कारण- अकारण बस यू ही मिलते जायेगे,
कभी दुश्वारिया पता चले तो बस इतना करेगे,
तेरे नाम की दुआ पढ़ उससे फरियाद करेंगे॥ "


१० .




ये मत सोचना के तुम मेरे लिए कुछ खास हो,
रुपहले सपनो का तुम एक आभास हो,
रंगों को मेरे जीवन में सजाया था कभी तुमने
रंग धुल गए है अब मै खुश हूँ तुम आबाद हो॥


Sunday, September 6, 2009

बस थोडा सा आर्शीवाद चाहिए

(स्टुडेंट लाइफ - कहते है कि जिंदगी का सबसे खूबसूरत सफ़र होता है .... अब वो तो रहा नहीं सिर्फ यादें है ....एक पुरानी कविता प्रस्तुत कर रही हूँ शिक्षक दिवस के अवसर पर .....मेरी दो टीचर्स जो उस समय मेरी आदर्श हुआ करती थी ...खासा लगाव था उनसे ... सरोज दुबे मैम और नीलिमा श्रीवास्तव ..... फेरवेल में जब ये कविता पढ़ी तो टीचर्स का असीम प्रेम मिला ......मेरी जिंदगी का खूबसूरत पल था वो .....तो आइये मेरे साथ शामिल हो जाइए अपने स्टुडेंट लाइफ के दिनों में ....और जी लेते है वो लम्हा एक बार फिर )




कुछ नहीं मांगते है गुरुवर आपसे
हो सके तो बस इतना एहसान कीजिये
पाया बहुत ज्ञान हमने आपसे
अब आप थोडा आर्शीवाद दीजिए



सताया बहुत हमने आपको
बच्चा समझकर माफ़ कर दीजिए
याद आता है वो समय हमको आज
जब कक्षा में आपने हमें दण्डित किया था



उस समय तो क्रोध ने हमें घायल किया था
पर आज प्रेम ने हमें पागल किया है
सोचते है जब हम यहाँ से चले जायेंगे
कही आप हमको भुला तो न देंगे



भुला भी दिया अगर आपने हमको
तो स्वप्नों में हम पढने आते रहेंगे
कैसे करेंगे भावना पे काबू
जब इस कॉलेज को छोड़ कर चले जायेंगे



अश्रु भी चक्षु से जो झलक गए अगर
हमारे लिए वो भी काफी न होंगे
सिखाया बहुत कुछ आपने हमको
एक बात और हमको सिखा दीजिए



आपको देखे बिना नेत्र रहेंगे अधूरे
हमारे नैनों को बस आप मना लीजिये
मिलेंगे भविष्य में बहुत गुरूवर हमको
आपसा मिल गया तो चमत्कार होगा



मिल भी गया तो सच कहते है हम
आपकी स्मृति सदैव ताज़ा रखेंगे




Thursday, August 27, 2009

उसको देखा तो

(आप सबको नमस्कार, प्यार, सलाम ! साथ ही शुक्रिया... जो आपने हमें प्रोत्साहित किया और ढेर सारा प्यार दिया...उम्मीद है कि आप हमेशा ही अपने बहुमूल्य विचारो से मुझे अवगत कराते रहेंगे और साथ ही अपना स्नेह यूहीं बनाए रखेंगे। )


वो जीना चढ़ रहा था
सर पर ईंटो की छाव लिए
सीढियां थोडी ज्यादा थी
चढ़ता जा रहा था बिना कोई पड़ाव लिए
माथे का पसीना छलक कर
ठुड्डी तक गया था
ठुड्डी पर ठहरी वो बूँद
कोहिनूर सी लगी मुझे
जब वो टपक कर उसकी बेटी पर जा गिरी थी
बिटिया ने देखा ऊपर
मुस्कुरा कर पूँछ ही लिया



बाबा , " खाना खाने कब आओगे ?
अब छलक रहा था वात्सल्य आँखों में मोती बनकर,
ममता बरस पड़ी थी एक सीधे - सादे प्रश्न पर,
सूरज की चांदनी में स्याह पड़ा वो धुआं सा चेहरा ,
एक मासूम सी हँसी हँसा,
पाँव आगे बढा कर खनकती आवाज से बोला,
तू खेल पर कहीं दूर मत जइयो .....
जा जाकर मदद कर दे अम्मा की
अच्छा सुन ! रहने दे थक जायेगी
छाँव में बैठ जाके
बस काम निपटा के आते हैं।



मैंने नभ को निहारा, फिर धरती को..
होंठो को दांतों में दबाकर, वीरान सी आँखों में ठंडक लिए
आप ही कुछ कह गई ....
चल मान गई तेरी खुदाई....


"शुक्र है शफ़क़त - -वालदैन से नवाजा है तूने
वरना तेरी दुनिया में रिश्तो का कारोबार भी तो है"




Thursday, August 6, 2009

"जिन्दगी के सुख चुराए जब "

(जीवन से कुछ पल निकाल फिर हाज़िर हुई हूँ आज। एक नई सोच के साथ.... सुना है कि ईश्वर के पास एक बहीखाता होता है ,जिसमें हमारे भूत, भविष्य और वर्तमान का लेखा- जोखा होता है, कब, क्या कहाँ, कैसे होगा ये सब पूर्व निर्धारित है..... सोचिये वो बहीखाता हाथ लग जाये तो... आप सब का तो नहीं जानती पर हम तो कुछ यूँ कर गुज़रे शायद .......)






मेरे खुदा बस इतना रहमत कर दे,
ज़िन्दगी की किताब की 'इंडेक्स' दे दे,



मै सिर्फ इतना करूंगा..
किताब के वर्क पढ़..
ख़ुशी, गम के पन्नो का नंबर
नोट कर लूँगा



जब कभी तुम थक जाना
मै अपनी मर्जी से वर्क पलट
एक हिस्सा जिन्दगी जी लूँगा



मेरा फ़रेब बस इतना होगा
जल्दी -जल्दी ख़ुशी के वर्क पढ़ ...
लम्हा - लम्हा वो वक़्त जी लूँगा



हाँ तुम्हारी प्लानिंग गड़बड़ होगी
नाराजगी भी जायज हो शायद ..
मुझे सजा सुना देना मौत की
गम के दिनों से तो मौत भली



सफाई में इतना कहना है मुझे



"तेरी लिखी पे मैंने ..
अपनी सोच डाल दी...
अपनी खुदी खुद पर निसार दी...
मैंने लिखी कुछ एक साथ जी ली...
जो अच्छी लगी जिन्दगी,
जाम जान फटाफट पी ली।



कुसूर इतना है मेरा
तूने फलसफे बनाए जिंदगी के
मैंने उसमें अपनी मर्जी से ...
आसानी ढूंढ ली.



मेरी जिंदगी की सहूलियत को
गुनाह जाना है तुमने ,
मुझे सजा देने का हकदार भी खुद को
माना है तुमने ,
संसार को तो नश्वर बनाया है तुमने ,
अचंभित हूँ ....और इसमें ही जीवन सजाया है तुमने




हे अजेय, अजन्मा, अरूपा, सर्व्सक्तिमान
मुझे तो बस इस शाश्वत सत्य को अपनाना है ,
तिनका - तिनका दुःख सहने से बेहतर तो ...
मौत को गले लगाना है ,
देखो इसमें तुमको भी आसानी होगी ,
प्रकृति का नियम भी कायम रहेगा ,
और मरने में बस थोडी मेरी मनमानी होगी




लगता है कन्विंस हो गए हो
या फिर मैं और बोलू .......


सोचने के लिए वक्त चाहिए तो ले लो,
पर निर्णय थोडा जल्दी और पक्ष में देना ..
पल भर का तनाव भी अच्छा नहीं लगता,
गम का कोई लम्हा सच्चा नहीं लगता ,
यू नो " सुख और खुशियों की आदत सी पड़ गई है मुझे "