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Thursday, August 6, 2009

"जिन्दगी के सुख चुराए जब "

(जीवन से कुछ पल निकाल फिर हाज़िर हुई हूँ आज। एक नई सोच के साथ.... सुना है कि ईश्वर के पास एक बहीखाता होता है ,जिसमें हमारे भूत, भविष्य और वर्तमान का लेखा- जोखा होता है, कब, क्या कहाँ, कैसे होगा ये सब पूर्व निर्धारित है..... सोचिये वो बहीखाता हाथ लग जाये तो... आप सब का तो नहीं जानती पर हम तो कुछ यूँ कर गुज़रे शायद .......)






मेरे खुदा बस इतना रहमत कर दे,
ज़िन्दगी की किताब की 'इंडेक्स' दे दे,



मै सिर्फ इतना करूंगा..
किताब के वर्क पढ़..
ख़ुशी, गम के पन्नो का नंबर
नोट कर लूँगा



जब कभी तुम थक जाना
मै अपनी मर्जी से वर्क पलट
एक हिस्सा जिन्दगी जी लूँगा



मेरा फ़रेब बस इतना होगा
जल्दी -जल्दी ख़ुशी के वर्क पढ़ ...
लम्हा - लम्हा वो वक़्त जी लूँगा



हाँ तुम्हारी प्लानिंग गड़बड़ होगी
नाराजगी भी जायज हो शायद ..
मुझे सजा सुना देना मौत की
गम के दिनों से तो मौत भली



सफाई में इतना कहना है मुझे



"तेरी लिखी पे मैंने ..
अपनी सोच डाल दी...
अपनी खुदी खुद पर निसार दी...
मैंने लिखी कुछ एक साथ जी ली...
जो अच्छी लगी जिन्दगी,
जाम जान फटाफट पी ली।



कुसूर इतना है मेरा
तूने फलसफे बनाए जिंदगी के
मैंने उसमें अपनी मर्जी से ...
आसानी ढूंढ ली.



मेरी जिंदगी की सहूलियत को
गुनाह जाना है तुमने ,
मुझे सजा देने का हकदार भी खुद को
माना है तुमने ,
संसार को तो नश्वर बनाया है तुमने ,
अचंभित हूँ ....और इसमें ही जीवन सजाया है तुमने




हे अजेय, अजन्मा, अरूपा, सर्व्सक्तिमान
मुझे तो बस इस शाश्वत सत्य को अपनाना है ,
तिनका - तिनका दुःख सहने से बेहतर तो ...
मौत को गले लगाना है ,
देखो इसमें तुमको भी आसानी होगी ,
प्रकृति का नियम भी कायम रहेगा ,
और मरने में बस थोडी मेरी मनमानी होगी




लगता है कन्विंस हो गए हो
या फिर मैं और बोलू .......


सोचने के लिए वक्त चाहिए तो ले लो,
पर निर्णय थोडा जल्दी और पक्ष में देना ..
पल भर का तनाव भी अच्छा नहीं लगता,
गम का कोई लम्हा सच्चा नहीं लगता ,
यू नो " सुख और खुशियों की आदत सी पड़ गई है मुझे "