तुम्हारे होने पर शक करूं
या तुम्हें बेसबब मानू,
तुम पर ऐतबार है
पर ensure नहीं हूं इस बार
देखो न।कैसा फ़साद फैला है दुनियां में
कोई नहीं है ज़िम्मेदार
कमियां गिनाने वाले हजार
तुम्हारा नाम लेकर कुछ
तुम्हें बदनाम करके कुछ
ललकार रहें हैं तुझको
नज़ारा देख कर सारा,
पेशानी पर बल पड़ा होगा
बड़े मुंसिफ कहाते हो
कर दो मुंसफी इस बार
बचा लो अपने बंदो को,
इशारा करो किसी साइंस दा को
नब्ज पकड़ कर COVID 19 की
तोड़ दे वायरस का घमंड
Vaccine का इजा़द करा दें
debate के mood में नही हूं मै अब
बचा लो अपनी अना
के तुम्हारे होने के वास्ते मेरा होना जरूरी है
बहुत आहुितयां हविष्य हो चुकी रण में
नतीजा कब तलक लटकाओगे?
तो क्या मान लू मै फिर
तुम फ़साने से ज़्यादा और कुछ नही।।
Friday, April 17, 2020
Tuesday, April 7, 2020
Wednesday, February 15, 2012
तुम हम दोनों से प्यार करो ना
तुम मुझे चाँद ना दिखाया करो
मै इमोशनल हो जाती हूँ
औ घर पर तो बिल्कुल नहीं
एक बार
जब तुम नहीं थे साथ
रात मेरी इससे नज़र मिल गई
मै भी इसके साथ तारो में खो गई
बस मौका जान
ये बेशर्म! बालकनी के करीब आ गया
आसमा भी लाया था
एक बादल का टुकड़ा गार्ड बन आया था
सितारे लिविंग रूम के बाहर रखे ..
गमलो पर सुस्ता रहे थे
ना जाने किस बात पर बादल
गमलो पर सुस्ता रहे थे
ना जाने किस बात पर बादल
बिजली पर गुर्रा रहे थे .
फिर बिजली
गरजी बहुत तेज
के मैं बिस्तर छोड़ बाहर आ गई
बेखयाली में
एक कैक्टस पर हाथ पड़ गया
लहूलुहान हाथ लिए तुम्हे ढूढने लगी
छुई -मुई का पौधा दिखा तो
उससे खेलने लगी
पत्तो पर बैठे जादूगर सितारे
कमाल कर गए
हाथो से दर्द खींच ओस बन
पत्तो पे सज गए
चाँद बादलों के सोफे पे बैठा
दूर से मुस्कुरा रहा था
मेरी मदद कर ख़ुशी जता रहा था
तुम्हारे बिना मुझे कंपनी देता है
एक बात कहूं...
मै उसके साथ इमोशनली अटैच्ड हूँ
मेरे साथ उसको भी स्वीकार करो ना
तुम हम दोनों से प्यार करो ना
छुई -मुई का पौधा दिखा तो
उससे खेलने लगी
पत्तो पर बैठे जादूगर सितारे
कमाल कर गए
हाथो से दर्द खींच ओस बन
पत्तो पे सज गए
चाँद बादलों के सोफे पे बैठा
दूर से मुस्कुरा रहा था
मेरी मदद कर ख़ुशी जता रहा था
तुम्हारे बिना मुझे कंपनी देता है
एक बात कहूं...
मै उसके साथ इमोशनली अटैच्ड हूँ
मेरे साथ उसको भी स्वीकार करो ना
तुम हम दोनों से प्यार करो ना
Tuesday, August 30, 2011
ब्याह
तुम्हारे गीतों और मेरी नज्मों
के बीच कुछ चल रहा है
वो बज़्म याद है
जब तुम्हारे गीत के साथ
उस शब् नज़्म ने जुगलबंदी की थी
हया झलक रही थी आँखों से
गीत बेशर्मी पे अमादा
संस्कार नहीं सिखाये तुमने !
एक ग़ज़ल ने कहा है मुझसे
भरे भवन में आँखों से बात होती है
मुलाकाते, बातें तय होती हैं
मै दोनों के रिश्ते की बात करने आई हूँ
अगली लग्न में ब्याह करा देते है
मोहल्ले में काना-फूसी और नैन मटक्का बंद :-)
माय री! सदके जाऊं मै
के बीच कुछ चल रहा है
वो बज़्म याद है
जब तुम्हारे गीत के साथ
उस शब् नज़्म ने जुगलबंदी की थी
हया झलक रही थी आँखों से
गीत बेशर्मी पे अमादा
संस्कार नहीं सिखाये तुमने !
एक ग़ज़ल ने कहा है मुझसे
भरे भवन में आँखों से बात होती है
मुलाकाते, बातें तय होती हैं
मै दोनों के रिश्ते की बात करने आई हूँ
अगली लग्न में ब्याह करा देते है
मोहल्ले में काना-फूसी और नैन मटक्का बंद :-)
माय री! सदके जाऊं मै
शफक सा सुर्ख लाल -पीला घाघरा
उस पर हर्फो से ज़रिदारी
इस लफ्फाजी लिबाज़ में
जन्नत की अप्सरा फींकी
उस पर हर्फो से ज़रिदारी
इस लफ्फाजी लिबाज़ में
जन्नत की अप्सरा फींकी
बोल ऐसे टाँके है जैसे
जैसे हरसिंगार के फूल पर
ठहरा बसंत
बधाई हो! जन्नत सी हो इनकी गृहस्ती
खुश हूँ बहुत
मुलाकात का जी चाहा तो चली आई
मालूम है तुम्हे ?
मेरी नज़्म हमिला है
जश्न की तैयारी करो
अब तो बगिया में बहार आयेगी
मै चाहती हूँ एक नज़्म जन्मे ले
तुम चाहोगे के गीत आये
एक दुआ है बस
रब्बा! जों भी दे तंदरुस्त दे
Tuesday, August 23, 2011
बावरी लड़की
घनघोर बारिश हुई बीते दो दिनलेकिन आज सिर्फ फुहारे गिरे
धूप से कहूं थोड़ी नरमी दिखाए
हवा हौले हौले बदन को छू सरक जाए
गुलमोहर बिछा दूं रस्ते पे
बेलों को लहरा दूं थोडा
द्वार रंगोली बनाऊं
रुच-रुच आरती थाल सजाओं
खूब झूमूं, लजाऊँ, गुनगुनाऊ
कर लूं थोडा सा श्रृंगार
स्टोन वाली बिंदी जंचती है मुझ पर
काजल से चमक उठती है आँखे मेरी
वो मेटेलिक कंगन जिसमे लाल,पीले और हरे स्टोन जड़े है
फब्दा मुझ पर,
वार्डरोब खोले खड़ी हूँ
क्या पहनूं
जिसमें, सिंपल, सोबर और गुड लुकिंग लगूं
ये पर्पल कलर वाला अच्छा है
उनकी चोइस जैसा :-)
बस अब बंद करो संदेशे भेजना
शहर में रह कर इतनी दूरी अच्छी नहीं होती
नहीं होता इंतज़ार
जल्दी से आओ ना
ये बातूनी लड़की
बावरी हों चुकी है
तुम्हारी बाट जोहते-जोहते
Sunday, July 17, 2011
Thursday, May 12, 2011
इल्जाम
हमें नहीं लिखना रेत पर तुम्हारा नाम
हमें नहीं रखना दिल में तुम्हारा अक्स
हमें नहीं बैठाना तुम्हे पलकों पर
हम हाथ की लकीरों में भी नहीं चाहते तुम्हे
कसम से! दुआओं में भी कभी नहीं माँगा तुम्हे
कोई रस्म नहीं निभाई इखलाक की
दूसरों से क्या...
खुद से भी जिक्र नहीं किया कभी तुम्हारा
अम्मी कहती हैं अच्छा करो तो अच्छा होता है
हम हाथ की लकीरों में भी नहीं चाहते तुम्हे
कसम से! दुआओं में भी कभी नहीं माँगा तुम्हे
कोई रस्म नहीं निभाई इखलाक की
दूसरों से क्या...
खुद से भी जिक्र नहीं किया कभी तुम्हारा
अम्मी कहती हैं अच्छा करो तो अच्छा होता है
इस बाइस अडचनों पे खड़े हो जाते हैं साथ में
अपना ही भला करते हैं हम दिमाग से करते हैं काम हम
दिल-विल में विश्वास नहीं करते
गोया बड़े शातिर, चालक और खुदगर्ज़ हैं हम
हमें मासूम समझने की गलती ना करना
Friday, April 29, 2011
शाम, रास्ता, सूरज, इश्क
पिछले साल लिखी थी ये नज़्म....न जाने क्यों नहीं पोस्ट की ...आज ड्राफ्ट में कुछ टुकड़े तलाश रही थी, तभी मिली ...पढ़कर हंसी आई...सच! कितना बदल गए हैं हम...आज की तारीख में अगर ऐसा ख्याल आता तो हम यूँ न लिखते. इस एक साल के सफ़र ने सोच को मच्योर कर दिया...लेकिन हमने भी नहीं की छेड़खानी सहज भावो से....सो वैसा ही पेश कर रहे हैं :-)
मेरे तो रास्ता वही है
आने -जाने का
पिछले डेढ़ बरस से तो नहीं बदला
रोज़ ऑफिस से लौटते वक़्त
मिलता हैं मुझसे मवैया पुल पर
क्या-क्या नहीं करता मुझे
रिझाने के लिए
कसम से! पंद्रह मिनट के रास्ते में
पांच बार ड्रेस बदलता हैं
कभी लाल और पीले का कॉम्बीनेशन
तो कभी नारंगी लाल
हाँ!कभी ब्लैक एंड व्हाइट भी,
हैण्डसम तो तब लगा, जब
ग्रे शर्ट के साथ सिन्दूरी
स्टोल पहना के आया था
उसी दिन मेरा दिल उसपे आया था
कहता कुछ नहीं
बस ताकता रहता हैं
कभी पेड़ो के झुरमुट से
कभी बादल के चिलमन
कभी फ्लोर मिल की खिड़की से
और कभी बिल्डिंग के पीछे से
मेरी स्कूटी को भी ना जाने
कितनी बार फालो किया है उसने
सांझ का सफ्फाक शफक
और सुरमई सूरज
आशना है मुझसे वो
डर है तो एक बस
किसी दिन प्रोपोज ना कर मुझे
अब तुम ही बताओ
ऐसे में
कैसे इन्कार कर पाऊंगी मै ?
Friday, April 1, 2011
दिल चाहता है
मेरा दिल चाहता है
शून्य हो जाए
किसी भी जींस का बादल
धर्म बदल बन जाए कब्र
मृदुल हो जाए नियम
दुनिया के किसी भी साहित्य,
किसी भी कला का कोई भी कलाकार
मृत हो जाए सारे जीवाश्म
विलुप्त हो जाए सभ्यताएं
जो करोडो वर्षो तक विकासक्रम
और इतिहास को चिन्हित करते हैं
उत्खनन में खोजी मेरी चाहत की निशानियाँ
कार्बन डेटिंग से मिल जाए प्रमाण
धरती का सारा सौन्दर्य
मेरे प्रेम के आगे कुरूप हो जाए
विवशता शब्द को मिल जाए मृत्युदंड
बावजूद इसके
मेरा प्रेम अमर हो जाए
तुम्हे इतना प्यार करूँ
के क्षीर सागर का जल समाप्त हो जाए सूरज के हीलियम, हाइड्रोजन, टूट- टूट कर
गले न, अपितु सड़ जाए नाभिक में ही
हवाओं की गति शिथिल होते-होते गले न, अपितु सड़ जाए नाभिक में ही
ऑक्सीजन को सोख ले कार्बन
ऊर्जा का उत्सर्जन बंद हो जाए शून्य हो जाए
किसी भी जींस का बादल
धर्म बदल बन जाए कब्र
मृदुल हो जाए नियम
दुनिया के किसी भी साहित्य,
किसी भी कला का कोई भी कलाकार
ना दे पाए आकार मेरी चाहत को
शिल्प ,अक्षर निराकार हो जाए मृत हो जाए सारे जीवाश्म
विलुप्त हो जाए सभ्यताएं
जो करोडो वर्षो तक विकासक्रम
और इतिहास को चिन्हित करते हैं
रहे तो बस प्रेम सी पावन
उदभव और विनाश सी शाश्वतउत्खनन में खोजी मेरी चाहत की निशानियाँ
कार्बन डेटिंग से मिल जाए प्रमाण
धरती का सारा सौन्दर्य
मेरे प्रेम के आगे कुरूप हो जाए
विवशता शब्द को मिल जाए मृत्युदंड
बावजूद इसके
मेरा प्रेम अमर हो जाए
Sunday, March 27, 2011
जी नहीं चाहता

जी नहीं चाहता कोई नज़्म लिखूं
किसी ख्याल की कोई आमद ही नहीं
ख्वाब आते भी हैं तो भूल-भूल जाते हैं हम
याद रखे उन्हें ऐसी नियामत भी नहीं
मौसमो के बदलने से
सबा के बहकने से,
बूंदों के बरसने से,
सुनहली धूप के गिरने से,
चांदनी के आने- जाने से,
मन नहीं मचलता अब,
तसव्वुरात में
कोई रंग नहीं उभरता अब|
ये सारे आलम मेरे
ये सारे आसार
अच्छे शगुन नहीं
लिखना अब मुनासिब नहीं
लज्ज़त नहीं
तासीर नहीं
ना! कोई तहरीर नहीं
ये अस्नामगरी* ना होगी हमसे
कौन जाने क्या लिखा है
इन तहरीरो की तकदीरो में
उस तरफ से कोई हवा नहीं बहती अब
इधर स्याही कुछ नहीं कहती अब
देखो! कोई सवाल ना करना हमसे
मेरे खोने की बात ना करना हमसे
कमबख्त!उम्मीद इस बाबत भी...
फ़िदा है हम पर
के सन्नाटे में ही कोई बात चले||
Monday, February 21, 2011
एक शाम कुछ यूँ हुआ
एक शाम कुछ यूँ हुआ
फलक समंदर में
तब्दील होने लगा
तब्दील होने लगा
बादल लहरों के माफिक
दौड़ -दौड़ साहिल तलाशने लगे
ज्वार-भाटे के गर्जन .....
आकाश में गश्त करने लगे
धरती की कश्ती में सिक्का फेंक
सूरज लुटने ही वाला था
के
चाँद ने आकर बाजी पलट दी
के
चाँद ने आकर बाजी पलट दी
(ना जाने कितनो की बालाएं अपने सर लेगा
ये चाँद)
आसमां ठहर गया
सागर नहीं बना,
धरती भी अपनी जगह कायम
पाताल होने से बच गई
अब के बार कुदरती
प्यादों ने कोई साजिश की तो
कसम से !
ए खुदा सुन !
क़यामत तेरे घर होगी
समझा दे अपनी कुदरत को
हम खुदाबन्द ..
इन्साफपरस्त लोग हैं
अदालत ज़मी पे बैठेगी
पेशी भी यहीं पड़ेगी
सिर्फ तारीखे मिलेंगी
लगाना फिर चक्कर पे चक्कर
केस फाइल नहीं किया है
मामला मुल्तवी हुआ...
बर्खास्त नहीं
ऑन रिकॉर्ड ना सहीऑफ रिकॉर्ड है
एक और बात -
सिर्फ तुम ही नहीं रखते बही खाता
फाइल री-ओपन यहाँ भी होती हैं
और सेटेलमेंट भी
करो अब चुनाव
क्या चाहते हो ?
Monday, January 17, 2011
राय
बातें ज़ुबा पे आ
अक्सर रुक जाया करती हैं|
जो नही कहना होता है
वो सब कह जाया करती हैं|
आज मैं वो सारी आदतें अपनी
ताक पर रख आई हूँ|
आज ना झुकेंगी मेरी पलकें
नही लड़खड़ाएगी ज़ुबां
आज ना सहमूँगी मैं
लेकिन
ऐसा ही कुछ कहा होगा ना
राधा ने श्याम से ?
एक कथानक तैयार कर रही थी
तुम्हारी राय लेने आई हूँ
ये विअर्ड फेशिअल इक्स्प्रेशन देना बंद करो
कुछ बोलोगे ?
या मै जाऊं ?
अच्छा सुनो !
पेपर्स मेज पर छोड़ जा रही हूँ
जब नोर्मल होना तो पढ़ लेना
रिंग कर दोगे तो आ जाऊंगी
डिशकशन के लिए
अजीब बन्दा है!
देखते ही ब्लैन्क हो जाता है
कोई और तो नहीं होता ?
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
चलते चलते एक शेर भी कहते चले ---
"मै तुझे चाहूं या ना चाहूं मेरी मर्जी ,
मेरी चाहत तेरी मिल्कियत नहीं जानां"
अक्सर रुक जाया करती हैं|
जो नही कहना होता है
वो सब कह जाया करती हैं|
आज मैं वो सारी आदतें अपनी
ताक पर रख आई हूँ|
आज ना झुकेंगी मेरी पलकें
नही लड़खड़ाएगी ज़ुबां
आज ना सहमूँगी मैं
नही बदलूँगी बात का विषय
ना समेटूंगी खुद को अपनी ही ज़द में|
इंतेज़ार कर रही थी के तुम ही बोलोगे
इंतेज़ार कर रही थी के तुम ही बोलोगे
मेरी हदे जानते हो तो मुह खोलोगे
लेकिन नही किया तुमने वैसा
मैने सोचा था जैसा|
तो सुनो
हाँ! हाँ!अच्छे लगते हो मुझे
प्यार करने लगी हूँ मै तुम्हे
तुम्हे कोई ऐतराज़ तो बोलो ?
लेकिन नही किया तुमने वैसा
मैने सोचा था जैसा|
तो सुनो
हाँ! हाँ!अच्छे लगते हो मुझे
प्यार करने लगी हूँ मै तुम्हे
तुम्हे कोई ऐतराज़ तो बोलो ?
लेकिन
पहले सुन लो बात मेरी
इनकार किया तो भी रोक नही पाओगे
समझाओगे तो हार जाओगे
बाधा समझते हो राह की ...
हमेशा पुल जैसा ही पाओगे
इनकार किया तो भी रोक नही पाओगे
समझाओगे तो हार जाओगे
बाधा समझते हो राह की ...
हमेशा पुल जैसा ही पाओगे
ऐसा ही कुछ कहा होगा ना
राधा ने श्याम से ?
तुम्हारी राय लेने आई हूँ
ये विअर्ड फेशिअल इक्स्प्रेशन देना बंद करो
कुछ बोलोगे ?
या मै जाऊं ?
अच्छा सुनो !
पेपर्स मेज पर छोड़ जा रही हूँ
जब नोर्मल होना तो पढ़ लेना
रिंग कर दोगे तो आ जाऊंगी
डिशकशन के लिए
अजीब बन्दा है!
देखते ही ब्लैन्क हो जाता है
कोई और तो नहीं होता ?
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
चलते चलते एक शेर भी कहते चले ---
"मै तुझे चाहूं या ना चाहूं मेरी मर्जी ,
मेरी चाहत तेरी मिल्कियत नहीं जानां"
Wednesday, December 22, 2010
उम्र
ये ना कहना कभी
के मैंने तुम्हे
तन्हा छोड़ा
याद है साथ चलते चलते
राह में अक्सर
मैं रुक जाया करता था
तो
तुम नाराज़ हो जाए करती थी
हर कदम पर मैने
ना जाने कितनी नज्में बोई हैं
हर नज़्म हाथ थामेगी
कुछ डेलिकेट हैं
कुछ गबरू ज़वान सी
कुछ शज़र का रूप ले चुकी होंगी अब तक
कुछ नज्में उम्मीद से भी हो शायद
ये माथे पर शिकन और लबों पे मुस्कुराहट
बात पूरी होने दो
फिर पोज़ देना
दरअसल वो नज्में नही है
जीरोक्स करके रखी है उम्र मैने
ज़ज़्बातों को छोड़ो
प्रॅक्टिकली सोचो
तो अब इस से ज़्यादा
मै
क्या दे सकता हूँ तुम्हे?
रोना मत
तुम्हारे आंसुओं से
ये चायनीज़ प्लांट भी नही फलने वाला
जानती नही क्या
आंसुओं में सॉल्ट होता है
औ मिट्टी में नमक हो तो प्लांट
मुरझा जाता है
हमारे रिश्ते में नमक ज़्यादा था शायद
चाय में चीनी कितनी लोगी ?
ओह! तुम तो विदाउट शुगर लेती हो
के मैंने तुम्हे
तन्हा छोड़ा
याद है साथ चलते चलते
राह में अक्सर
मैं रुक जाया करता था
तो
तुम नाराज़ हो जाए करती थी
हर कदम पर मैने
ना जाने कितनी नज्में बोई हैं
हर नज़्म हाथ थामेगी
कुछ डेलिकेट हैं
कुछ गबरू ज़वान सी
कुछ शज़र का रूप ले चुकी होंगी अब तक
कुछ नज्में उम्मीद से भी हो शायद
ये माथे पर शिकन और लबों पे मुस्कुराहट
बात पूरी होने दो
फिर पोज़ देना
दरअसल वो नज्में नही है
जीरोक्स करके रखी है उम्र मैने
ज़ज़्बातों को छोड़ो
प्रॅक्टिकली सोचो
तो अब इस से ज़्यादा
मै
क्या दे सकता हूँ तुम्हे?
रोना मत
तुम्हारे आंसुओं से
ये चायनीज़ प्लांट भी नही फलने वाला
जानती नही क्या
आंसुओं में सॉल्ट होता है
औ मिट्टी में नमक हो तो प्लांट
मुरझा जाता है
हमारे रिश्ते में नमक ज़्यादा था शायद
चाय में चीनी कितनी लोगी ?
ओह! तुम तो विदाउट शुगर लेती हो
Saturday, December 18, 2010
रिप्लेस
रोज़ रोज़ बात करूँ भी तो क्या ?
बस यही सोच चुप हूँ हिचकियाँ नहीं आती मुझे
टेलीपैथी भी गई काम से
तुम्हे स्पेस चाहिए था ना
लो दिया मैंने
उम्र भर का स्पेस
एक बार वापस आ
देखना ज़रूर
तुम्हे किसने रिप्लेस किया है ?
Wednesday, December 15, 2010
आदमी सा वक्त
कितनी छिछली और सतही होती हैं
दीवारे वक़्त की
कभी उनमें कैद रुका सा आदमी
कभी बहता आदमी
दीवारे वक़्त की
कभी उनमें कैद रुका सा आदमी
कभी बहता आदमी
देखा तो होगा तुमने
दीवारों पे उड़ता आदमी
आदमी के मायने वक़्त है
या वक़्त के मायने आदमी
दगाबाज़ वक़्त या आदमी
मानो न मानो
ये वक़्त आदमी से कमतर नहीं
Monday, November 29, 2010
अक्षरों से बातें

अक्षरों
सुनो मेरी बातआओ मेरे पास
मैं तुम्हारे लिए वेणी बनाउंगी
खयालो से भी नाज़ुक
जलपरी से भी खूबसूरत
ज़ज्बात के जेवर पहना
एक अनुपम, अद्वितीय बाला बना
सोलह श्रृंगार कर
तुम्हे दुल्हन सा सजाऊँगी
तुम्हारे रूप पे कुर्बान
कुछ फक्कड़,
कुछ अनजान लोग
होंगे तेरे कद्रदान
करेंगे तुम्हारी पहचान
रत्न को परखते जोहरी के मानिंद
कुछ खुसरो, तकी मीर या ग़ालिब जैसे
रहस्यवाद और छायावाद में गुसल करते
प्रसाद, निराला और पन्त जैसे
तुझे भक्तिमार्ग में ले जा रहीम, रसखान
मीरा में बदल दें तो
प्रसिद्धि मिल जायेगी
ये सारे
अलग-अलग नामो से पुकारेंगे तुम्हे
इन सब से प्यार करना
किसी के ह्रदय पर कविता बन राज करना
किसी के उर नज़्म बन समाँ जाना
कोई शायरी कह आवाज दे शायद
तो किसी के लिए भीनी ग़ज़ल बन.....
जुबाँ से फिसल जाना
सभी के मन के अथाह सागर में
एक कोमल स्थान तो मिलेगा तुझे
ऐसा वादा है मेरा
एक निशब्द, अनजाना
लेकिन फिर भी जाना-पहचाना
अर्थयुक्त रिश्ता बन
बिन सवालों का जवाब तलाशे
दिल में राज करोगे तुम सारे
ऐसा नसीब सबका नहीं होता
कोई किसी के इतने करीब भी नहीं होता
मेरे निश्छल स्वभाव को पहचानो
चले आओ ......
कोई विनिमय नहीं
व्यापार नहीं
मेरा क्या ?
एक दिल ही है जों
बहल जाएगा
तुम्हारी इज्ज़त में इजाफा हो जायेगा
तो हे अक्षरों, शब्दों, मात्राओं, चन्द्र-बिंदियों
चले आओ
साथ में अल्प विराम और पूर्ण विराम
को भी लाओ
अब कैसी ये दूरी ?
कैसा फासला?
कैसा संकोच?
Tuesday, November 23, 2010
मौजूदगी
तेरे जाने का सबब मालूम नहीं
आने की भी वजह कहाँ थी कोई
आज बहुत याद आये तुम
सोचती रही
क्यों किया ऐसा ?
कोई गलती बताते मेरी
गुस्सा करते,
चीखते, चिल्लाते, झगड़ते
इल्ज़ाम लगाते
बिन आहट चले गए
दबे पाँव
अलमारी खोली
फाइल निकाली
वो नन्ही सी डायरी ...
जिसमें सिर्फ एक निशानी है तुम्हारी
तुम्हारा नाम
अपने ही हाथो से लिखा था तुमने
उन अक्षरों को बार-बार छू
तुम्हारी मौजूदगी को महसूस किया मैंने
अब इस बात पर तो कोई ऐतराज़ नहीं ना ?
आने की भी वजह कहाँ थी कोई
आज बहुत याद आये तुम
सोचती रही
क्यों किया ऐसा ?
कोई गलती बताते मेरी
गुस्सा करते,
चीखते, चिल्लाते, झगड़ते
इल्ज़ाम लगाते
बिन आहट चले गए
दबे पाँव
अलमारी खोली
फाइल निकाली
वो नन्ही सी डायरी ...
जिसमें सिर्फ एक निशानी है तुम्हारी
तुम्हारा नाम
अपने ही हाथो से लिखा था तुमने
उन अक्षरों को बार-बार छू
तुम्हारी मौजूदगी को महसूस किया मैंने
अब इस बात पर तो कोई ऐतराज़ नहीं ना ?
Tuesday, October 19, 2010
ख्वाब, ख्वाइश, तंज़
एक मुद्दत से तमन्ना है सिगार पीने की
चिंताओं को धुंए के गुबार में उड़ा देने की
हुक्के की गुड-गुड से सियाह ख्यालों को स्वाहा कर..
रक्काशो पर रुपया लुटाने की
चिलम को मुह में दबा, गमो का मसनद बना
सारे रिवाजो को घुँघरू पहना, ठहका लगाने की
रम, बीअर व्हिस्की वाइन का कॉकटेल बना
जाम हाथ में पकड़ झूम जाने की
ऐसे में कोई फ़िल्मी धुन बज उठे,
कदम थिरक उठे
और हम गा दें फिर
" मैंने होठों से लगाई तो हंगामा हो गया"
ख्वाइशे भी अजीब होती है ना
आज मेरी कलम बेबाक मूड में है
तोड़ दी मर्यादाएं सारी
जात इंसान की होती है
ये तो बदजात निकली
खैर!
ख्यालों को यूँ बहा सुकूँ से हूँ
बेलगाम होने का सुख
तृप्त हुई मै
आज़ाद !
मै एक आज़ाद रूह हूँ
छिः यू हिप्पोक्रेटिक डबल स्टैण्डर्ड पीपल
तुम दुनिया से विलुप्त क्यों नहीं होते ?
चिंताओं को धुंए के गुबार में उड़ा देने की
हुक्के की गुड-गुड से सियाह ख्यालों को स्वाहा कर..
रक्काशो पर रुपया लुटाने की
चिलम को मुह में दबा, गमो का मसनद बना
सारे रिवाजो को घुँघरू पहना, ठहका लगाने की
रम, बीअर व्हिस्की वाइन का कॉकटेल बना
जाम हाथ में पकड़ झूम जाने की
ऐसे में कोई फ़िल्मी धुन बज उठे,
कदम थिरक उठे
और हम गा दें फिर
" मैंने होठों से लगाई तो हंगामा हो गया"
ख्वाइशे भी अजीब होती है ना
आज मेरी कलम बेबाक मूड में है
तोड़ दी मर्यादाएं सारी
जात इंसान की होती है
ये तो बदजात निकली
खैर!
ख्यालों को यूँ बहा सुकूँ से हूँ
बेलगाम होने का सुख
तृप्त हुई मै
आज़ाद !
मै एक आज़ाद रूह हूँ
छिः यू हिप्पोक्रेटिक डबल स्टैण्डर्ड पीपल
तुम दुनिया से विलुप्त क्यों नहीं होते ?
Monday, October 11, 2010
स्रष्टि का निर्माण
कल पूर्णिमा थी
कलसे में भर ली चांदनी
आज सहर होते ही
आफताबी किरने भर ली
मटके में मैंने.
दरिया किनारे छुपा दिया मटका
कल रात जब
बादल चाँद को ढकेंगे
सिर्फ तारे आसमा से झाकेंगे
उनका बिम्ब दरिया के पानी पे बनेगा
तब तारो की परछाइयाँ बटोरूंगी
उस कलसे को हिफाज़त से सहेजूंगी .
ऐसा जाम किसी ने न बनाया होगा
खुदा को भी ये ख्याल ना आया होगा
लोग तो चाँद- तारे तोड़ने की बात करते है,
उनकी धरती से उनको छीनने की चाह रखते है
तेरे लिए ही तो मैं स्रष्टि बना रही हूँ
पञ्च तत्व बटोर कर ....
कुछ गहने पहना रही हूँ
मेरे हिस्से का आकाश इसमें समाया है
हवाओ के गेसुओ को इसमें पिरोया है
मेरी उर्जा की अग्नि का इसमें चूरन है
खिलखिलाहट से नम हुई आँखों का इसमें पानी है
मेरी सहनशक्ति धरती सी दीवानी है
मैंने जीते जी इन पञ्च तत्वों को तुमको भेट किया है
कहीं कोई दुनिया में ऐसी कहानी हो तो बताओ
ऐसा उपहार गर किसी ने किसी को भेट किया हो तो सुनाओ
तुम मुझे याद रखो
या के भूल जाओ
मैं न भूलूंगी
तुम्हे पूर्ण करने के लिए
मैंने क्या कुछ न किया .
प्रिया
Wednesday, September 29, 2010
हमको यूँ ही तो परिंदों से प्यार नहीं
कुछ तो है जों ख़ास नहीं ,हमको यूँ ही तो परिंदों से प्यार नहीं,
क्यों न आज इस राज से पर्दा उठाये ,
इस उन्सियत का किस्सा सुनाये.
इस कायनात में ...
हमने रंग भरना चाहा
गगन के कैनवस पर ...
मगन होकर मुझ कविता ने
एक गीत लिखना चाहा
हमने रंग भरना चाहा
गगन के कैनवस पर ...
मगन होकर मुझ कविता ने
एक गीत लिखना चाहा
मदमस्त चौकड़ी भरती
हिरनी सी लेखनी मेरी
गीत की जगह तस्वीर सजा बैठी
ख्वाबों का आशियाँ बना बैठी
हिरनी सी लेखनी मेरी
गीत की जगह तस्वीर सजा बैठी
ख्वाबों का आशियाँ बना बैठी
ऐसा भी कभी होता है कहीं

लफ्ज़ आकर लेते है क्या कभी
कुछ तब्दीलिया हुई थी कहीं
वरना लेखनी की ऐसी हिमाकत तो नहीं
कोई स्पर्श मेरे हाथो से टकराया था
उसने हौले से ब्रुश पकड़वाया था
मेरे जहन, दिल को इशारे पे नचाया था
ये तस्वीर उसके ही वजूद का सरमाया था
तस्वीर बहुत प्यारी थी ,
भविष्य की सारी जानकारी थी
घर, आँगन, फूल, ऋतुएँ
हरियाली परिंदे थे
चाह्चाहती सुबह ,
गुदगुदाती शामें थी
खुशगवार आलम था
भविष्य की सारी जानकारी थी
घर, आँगन, फूल, ऋतुएँ
हरियाली परिंदे थे
चाह्चाहती सुबह ,
गुदगुदाती शामें थी
खुशगवार आलम था
लेकिन!
बादलों का कुछ और ही मन था
उनको भी वही अपनी आँखें नम करनी थी
तस्वीर के कच्चे रंगों पर ही वो गिरनी थी
बादलों का कुछ और ही मन था
उनको भी वही अपनी आँखें नम करनी थी
तस्वीर के कच्चे रंगों पर ही वो गिरनी थी

कोई एब्सट्रैक्ट आर्ट रह गई थी अब वहाँ
जिसका कोई एक मतलब नहीं होता है यहाँ
सबके दिमाग अलग ढंग से सोचते हैं
एक तस्वीर के हज़ार व्याख्यान परोसते हैं
अरे हाँ !
कुछ बचा था वहाँ
दो परिंदे
एक तो मेरे पास महफूज़ है
दूजे को हिफाज़त से उड़ा ले गया कोई
सलामत है वो
है यही कहीं
लेकिन
तलाशती हूँ उसको
शायद दिख जाए मुझको
पगली सी हर परिंदे की तस्वीर खिचती चलती हूँ
फिर मिलान करती हूँ उसका अपनी एल्बम से

बेवकूफ! मैं
नहीं समझती
परिंदे होते नहीं ठहरने के लिए
वो तो बने हैं सिर्फ उड़ने के लिए
बस ! इसीलिए मैं उनसे प्यार करती हूँ
क्योंकि मैं भी परवाज़ में विश्वास करती हूँ
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