
( डॉ० श्याम गुप्ता जी के सुझावों पर अमल करते हुए कविता में कुछ परिवर्तन किया है, उम्मीद है की आप इसे पसंद करेगे)
जी चाहता है मन की गिरह खोल दें ,
जो कुछ अंदर छुपा हैं सब बोल दें ,
ज़माने के फेर में हम पड़ गए थे ,
उलझी सी दुनिया में उलझ से गए थे।
कोशिश की हवा के साथ बहने की,
झूठी, मक्कार, बेईमान,सफ्फाक बनने की,
इस दिशा में सारी जुगत लगाई,
जो नहीं सीखी थी वो भी तरतीब भिड़ाई।
अफ़सोस! मेरी पहली तरकीब काम न आई,
तकदीर हमें बेइज्जत कर वापस सही राह पर लाई,
हम अपनी हार का विश्लेषण कर गए,
और फिर पूरी लगन के साथ नए प्रयास में जुट गए ।
जब हालात की तासीर को चेहरे की तहरीर न बनने दिया,
तभी नैनों ने सच्चाई का दामन पकड़ लिया,
नयना बिन बोले सब कह गए ,
हम तो अपने ही नैनों से छले गए।
फिर भी हार नहीं मानी हमने ...
सोचा अबकी बार गहरी चाल चलेंगे,
राजनीति,कूटनीति, दोहरे मानदंड अपनाएंगे,
इन भ्रष्ट और गंदे लोगो के बीच कुछ तो जगह बनायेंगे।
पर इस बार भी वही हुआ ...
शह देते - देते, ज़माने की चाल से मात खा गए ,
और एक जीर्ण - क्षीण मोहरे का शिकार हो गए ।
अब तो लगता नहीं कुदरत हमारा साथ देगी ,
भ्रष्ट बनने की हमारी हर कोशिश नाकाम होगी ,
हालात कितने भी दुश्वार क्यों न हो,
हमारा हाल कितना भी बदहाल क्यों न हो ,
नहीं लगता है कि बुराई से समझौता कर पायेंगे,
संस्कारी है भई हम तो , भ्रष्ट न बन पायेगे ।
कुनितिवान, भ्रष्ट लोगों के मध्य संस्कारों की नींव डालेंगे ,
अपने आत्मबल, स्वावलम्ब और चरित्र को टटोलेंगे,
भरोसा है खुद पर के कीचड में कमल खिला सकते है,
हजार न सही कम से कम एक विधोत्मा, गार्गी या ध्रुव तो बना सकते है।
चलिए इन्ही विचारो के साथ आगे बढ़ते है ,
आँगन में पुरखों के संस्कारो का बीज रखते है,
अब तो इन्ही पौध को रोज़ सींचना है ,
नई तकनीको और स्वस्थ मस्तिष्क के साथ रोपना है।
आर्यावर्त की धरा पर एक बार फिर कुंदन बरसेगा ,
जब यहाँ का हर युवा पाश्चात्य देशो में .......
भारतीयता का लोहा मनवाएगा ,
और पश्चिम भारतीय संस्कृति के रंग में रंग जायेगा।
जी चाहता है मन की गिरह खोल दें ,
जो कुछ अंदर छुपा हैं सब बोल दें ,
ज़माने के फेर में हम पड़ गए थे ,
उलझी सी दुनिया में उलझ से गए थे।
कोशिश की हवा के साथ बहने की,
झूठी, मक्कार, बेईमान,सफ्फाक बनने की,
इस दिशा में सारी जुगत लगाई,
जो नहीं सीखी थी वो भी तरतीब भिड़ाई।
अफ़सोस! मेरी पहली तरकीब काम न आई,
तकदीर हमें बेइज्जत कर वापस सही राह पर लाई,
हम अपनी हार का विश्लेषण कर गए,
और फिर पूरी लगन के साथ नए प्रयास में जुट गए ।
जब हालात की तासीर को चेहरे की तहरीर न बनने दिया,
तभी नैनों ने सच्चाई का दामन पकड़ लिया,
नयना बिन बोले सब कह गए ,
हम तो अपने ही नैनों से छले गए।
फिर भी हार नहीं मानी हमने ...
सोचा अबकी बार गहरी चाल चलेंगे,
राजनीति,कूटनीति, दोहरे मानदंड अपनाएंगे,
इन भ्रष्ट और गंदे लोगो के बीच कुछ तो जगह बनायेंगे।
पर इस बार भी वही हुआ ...
शह देते - देते, ज़माने की चाल से मात खा गए ,
और एक जीर्ण - क्षीण मोहरे का शिकार हो गए ।
अब तो लगता नहीं कुदरत हमारा साथ देगी ,
भ्रष्ट बनने की हमारी हर कोशिश नाकाम होगी ,
हालात कितने भी दुश्वार क्यों न हो,
हमारा हाल कितना भी बदहाल क्यों न हो ,
नहीं लगता है कि बुराई से समझौता कर पायेंगे,
संस्कारी है भई हम तो , भ्रष्ट न बन पायेगे ।
कुनितिवान, भ्रष्ट लोगों के मध्य संस्कारों की नींव डालेंगे ,
अपने आत्मबल, स्वावलम्ब और चरित्र को टटोलेंगे,
भरोसा है खुद पर के कीचड में कमल खिला सकते है,
हजार न सही कम से कम एक विधोत्मा, गार्गी या ध्रुव तो बना सकते है।
चलिए इन्ही विचारो के साथ आगे बढ़ते है ,
आँगन में पुरखों के संस्कारो का बीज रखते है,
अब तो इन्ही पौध को रोज़ सींचना है ,
नई तकनीको और स्वस्थ मस्तिष्क के साथ रोपना है।
आर्यावर्त की धरा पर एक बार फिर कुंदन बरसेगा ,
जब यहाँ का हर युवा पाश्चात्य देशो में .......
भारतीयता का लोहा मनवाएगा ,
और पश्चिम भारतीय संस्कृति के रंग में रंग जायेगा।