कल पूर्णिमा थी
कलसे में भर ली चांदनी
आज सहर होते ही
आफताबी किरने भर ली
मटके में मैंने.
दरिया किनारे छुपा दिया मटका
कल रात जब
बादल चाँद को ढकेंगे
सिर्फ तारे आसमा से झाकेंगे
उनका बिम्ब दरिया के पानी पे बनेगा
तब तारो की परछाइयाँ बटोरूंगी
उस कलसे को हिफाज़त से सहेजूंगी .
ऐसा जाम किसी ने न बनाया होगा
खुदा को भी ये ख्याल ना आया होगा
लोग तो चाँद- तारे तोड़ने की बात करते है,
उनकी धरती से उनको छीनने की चाह रखते है
तेरे लिए ही तो मैं स्रष्टि बना रही हूँ
पञ्च तत्व बटोर कर ....
कुछ गहने पहना रही हूँ
मेरे हिस्से का आकाश इसमें समाया है
हवाओ के गेसुओ को इसमें पिरोया है
मेरी उर्जा की अग्नि का इसमें चूरन है
खिलखिलाहट से नम हुई आँखों का इसमें पानी है
मेरी सहनशक्ति धरती सी दीवानी है
मैंने जीते जी इन पञ्च तत्वों को तुमको भेट किया है
कहीं कोई दुनिया में ऐसी कहानी हो तो बताओ
ऐसा उपहार गर किसी ने किसी को भेट किया हो तो सुनाओ
तुम मुझे याद रखो
या के भूल जाओ
मैं न भूलूंगी
तुम्हे पूर्ण करने के लिए
मैंने क्या कुछ न किया .
प्रिया