Sunday, May 16, 2010

रूमानी मौसम

अभी कुछ दिनों पहले मौसम की आशिकी का शिकार हुए हम। मतलब सूरज का कम्प्लीटली किडनैप हो गया। घुमड़ - घुमड़ बादल गरजे.....मस्तानी सी हवा बह चली .... बारिश जैसा माहौल बना लेकिन बूंदों को बादल ही गटक गया....दो-चार गिरी....और बावरी धरती को धोखा हो गया....धरती भीगी नहीं इस बार .....थोडा और इंतज़ार ...लेकिन वसुंधरा पर महोत्सव हुआ....पंछियों ने लोकगीत गाये तो वृक्षों ने किया नृत्य.....ऐसे में हमारी क़लम मचली ....बहुत रोका- टोका लेकिन हमेशा की तरह कर गई बगावत। ढीढ कहीं की...बेलगाम होती जा रही हैं....अब देखिये इसकी हरकत........







सोंधी - सोंधी हवा,
गीली गीली यांदें,
भीनी-भीनी माटी,
थिरकती शाखे
एक काला सफ़ेद बादल ...
सूरज निगल गया।


दिल में दबा -दबा सा
एक पल रुका-रुका सा
मोर बन के
लबों से सरक गया।


पलाश की लाल घंटिया
रास्तो पर बिछ गई
रौनक ऐसी देख ....
हर श्रृंगार की कलियाँ चटक गई ।



चटकी फिर एक लम्हा भी ...
ना शाखों पर वो रुकी
पिय मिलन को आतुर
बिन मुहूर्त विदा हुई।



पत्तों ने भी गले लगा
बाबुल का फ़र्ज़ निभा दिया
सिली -सिली सी आँखों से
कली को विदा किया


आंधी में टूटी अमियाँ
इधर - उधर बिखरी हैं
ज्यूँ बिटिया-ब्याह के बाद
अंगना में फैली
सामानों की लड़ी हैं ।


कल का हंसी वो मौसम
थोड़ी राहत तो दे गया
मन हो मदहोश जिसमें
ऐसी रूमानी बरसात दे गया ॥



प्रिया

Wednesday, April 28, 2010

बड़ा गुरुर है गूगल को

Google-Chrome.jpg


बड़ा गुरुर है गूगल को

अपनी सोच

अपनी तकनीक पर

नंबर वन सर्च इंजन बना फिरता हैं

खोजी दस्तों का

मै नज़्म लिखना छोड़ दूं

गर तुमको ढूंढ के लाये वो




"प्रिया
"




Wednesday, April 7, 2010

सोचो ! जो हम परिंदे हो जाए







कभी - कभी यूँ ही
उठ जाते हैं दिल में
मासूम ख्याल
तुम्हारे साथ।



उड़ना चाहती हूँ
परिंदों जैसे।


सोचो !
जो हम परिंदे हो जाए।


किसी इलेक्ट्रिक वायर पर
बैठ चूँ-चूँ करें।


किसी टेलेफ़ोन टॉवर
पर बसेरा हो अपना।


घरो के सामने
बहती नाली पर
दोनों मिलकर पानी पिए।



फिर मैं फुर्र से उड़ जाऊं
तुम चीं चीं करते
ढूढने आओ मुझे




पूरा कुनबा मिलकर
पड़ोस वाले अरोड़ा साब
की छत पर फैले अनाज की
दावत उड़ाए।



किसी के आमद की आहट से
सारे एक साथ उड़ जाएँ।



जब तुम कैटरपिलर पर
मुहं साफ़ करो
तो मैं रूठ जाऊं
क्योंकि
मुझे नोन-वेज पसंद नहीं।




फिर तुम नन्हे से ...
गड्ढे में भरे
चुल्लू भर पानी में
गोता लगा, कसरत दिखा
मनाओ मुझे।



मैं तुमसे अलग
कुछ दूर फुद्कूं
पर
जल्द मान जाऊं।




रात में मेहनत के तिनको
से बने
बिन दरवाजे के घोसले पे
बेफिक्र तेरे सहारे सो जाऊं।



ज्यादा तमन्नाए कहाँ है मेरी
छोटी -छोटी चाहते
और संघर्ष में तुम्हारा साथ
क्या ऐसा ख्याल भी है
भौतिकवाद ?



Friday, March 19, 2010

अब निर्णय तुम्हारा है

मेरी ये रचना भारत की उन स्त्रियों के लिए है जो बस बिटियाँ है, बांके की दुल्हन हैं, छुट्टन की अम्मा है कहीं बडकी, मझली, छुटकी है उनके पास खुद का नाम नहीं, कोई पहचान ही नहीं, विरोध उसका स्वभाव ही नहीं, जो कुछ परिवार, समाज से मिला उसको भाग्य मान बैठी (मौन है तो ?क्या लेकिन सब समझती है )...देश ने वोट का अधिकार तो दिया लेकिन सर उठाकर जीने का हौसला नहीं। सोचती हूँ यदि महिला आरक्षण को मंजूरी मिल भी जाए तो क्या उनका भाग्योदय होगा ? या फिर मंत्रियों की पत्नियां और प्रशासनिक अधिकारियों के परिवारों की स्त्रियाँ ही इस का लाभ उठा पाएंगी ....खैर इस विवादित प्रश्न को विराम देते है। मुझे लगता है क़ि बनी बनाई व्यवस्था को बदलने के लिए कानून की नहीं बल्कि वैचारिक क्रांति और नज़रिए में बदलाव की जरूरत होती है.....इस विषय पर फिर कभी .......अभी तो बेनामी में खोई उन तमाम स्त्रियों की अंतर्मन की जुबा को मेरी कलम की तरफ से आवाज़ :-





स्त्री हूँ मैं
हमेशा से कमजोर समझते आये हो मुझको


नवरात्रि में
दुर्गा सप्तशती का पाठ
करते देखा है मैंने
क्यों?
मेरे शक्तिस्वरूपा, तेजस्वी, ओजपूर्ण
रूप से डर गए क्या ?


ओह! तो स्वार्थी हो तुम
पूजते हो क्योंकि -
मुझ दैवीय स्वरुपा की नज़र तिरछी हुई तो
नुक्सान हो सकता है.
अच्छा ! तो बल से डरते हो
मन से छल करते हो


कितने दोगले हो तुम
कितनी बार भावनात्मक खेल खेला है तुमने
राजनीति भी कर लेते हो अक्सर
और तुम्हारी कूटनीति का तो जवाब नहीं



मेरा अंश जो स्वतंत्र है
उसी को छलते हो रोज़
पर नहीं भूलते मेरे दर पर दिया जलाना



क्या लगता है तुमको ?
तुम्हारे घर, परिवार, समाज की स्त्रियाँ
नहीं समझती तुमको -



जब तुम जज़्बातों का छल करते हो
और वो मोहब्बत के पकवान बनाती है
रिश्तों की मजबूती के लिए



जब राजनीति करते हो
तो वो खामोश सी झूठ को परखती है
और आंकलन कर आगे बढ़ जाती है



कूटनीति करते हो
तो धैर्यवान नारी, चतुराई से
हालातों की दिशा बदलती है
देखी को अनदेखी कर
तुम्हारी गर्द झाड
मसरूफ हो जाती है जिंदगी में



बस! अब और नहीं
क्योंकि इतिहास साक्षी है
जितनी भी बार तुमने
ललकारा है स्त्री के धैर्य को
उसके आत्मसम्मान को,
साहस को
लोगों ने सिर्फ खोया है
पाया कुछ नहीं



कहीं लंका ढही
तो कहीं कौरव वध
अब निर्णय तुम्हारा है ॥


" प्रिया चित्रांशी"

घूंघट

Tuesday, March 9, 2010

एहसास खोए जब






लिखने बैठे हैं कुछ आज
बहुत दिनों बाद


सोचते थे
रब्त--ख्यालों के जहाँ से
आवाज़ देंगे एहसासों को
कोई गीत, ग़ज़ल, कविता, नज़्म या रुबाई
दौड़ी चली आयगी...
हमारे दामन में बेनक़ाब हो जाएगी


लेकिन ये क्या ?
दिल--गोशा में कोई जज़्बात ही नही ,
एक सुनहरी तीरगी
और
बाआवाज़ खामोशी के सिवा
कहीं कोई अश्आर ही नही


यक़ीनन!
एहसासों , जज़्बातों की चोरी हो गयी
या फिर
हमारी
ख्यालगाह में बुरी नज़र लग गई।
मुमकिन है!
किस ने टोना किया हो
या फिर
दरबाह बद्दुआ की शिकार हो गई।


लिल्लाह!
कोई तो आए
जो
नज़र उतरे ....
इस मायूसी से हमें उबारें
हमारी क़लम में मंतर फूँके
दिल में एह्सासातों का चश्मा फूट जाए



यकायक!
इस ख्यालात से एक तस्वीर उभरी-
हमने देखा -
कविता हमारे पास नमक लिए खड़ी थी
रुबाई हाथों में राई लेकर आई थी,
ग़ज़ल मौजूद थी तीखी मिर्ची के साथ
गीत ने कुछ लकड़िया सुलगाई थी।


सर से सात बार फेर जो झोंका था आग में
खुदा कसम ज़रा भी गंध ना आई थी


अब नज़र उतर चुकी थी हमारी
क़लम की पैराहन नज़्म बन...
सफो पर छप चुकी थी


एहसासों की दुनिया का ऐसा "सहयोग"
पहली बार महसूस किया था हमने



दरबाह - कलम