

बगीचे में एक अजीब इत्तफाक हुआ,
फूलों के मध्य अदभुद संवाद हुआ,
प्रकृति की विडम्बना देखिये.....
उस अनोखी कथा कि मैं साक्षी बनी हूँ,
भाग्यशाली हूँ शायद,
जो बयां करने लायक बनी हूँ..............
एक फूल ने दूसरे फूल से कहा,
जब तितलियाँ इठलाती हुई, पंख फड़फड़ाती हुई,
अपने शूल को चुभोकर, रस चूसती हैं,
पीड़ा होती हैं, कराह पड़ता हूँ मैं,
पर मैंने तुम्हारी सिसकियों को कभी नहीं सुना,
यही चलन हैं कुल का अपने ,
ऐसा विचार कर, चुप रहा, दर्द सहा,
फिर भी मस्त रहा ।
इस पर दूसरा बोला .........
बाग़ को महकाने के लिए,
अपनी संतति को बढ़ाने के लिए,
चक्षुओ में स्नेह दर्शाने के लिए,
सदियों से कुफ्र सहे हैं हमने ,
अजीब हैं न ये बात.........
मुझको भी भेदा था इसने,
आज, फूलों की आह का मर्म समझ में आया हैं,
खिलखिलाहट के पीछे का दर्द समझ में आया हैं
मुस्कराहट के पीछे कि ये दास्ताँ दिल पे निशां छोड़ गई ,
और कागज पर बिखर एक संजीदा व्यथा बोल गई .........