
मेरे घर के आगन में, परिंदे रोज आते हैं,
ची-ची करते, फुदकते, दाने चुगते ,
कटोरे का पानी पीते, और फिर उड़ जाते,
वो कलरव, वो अठखेलिया, वो मनोरम द्रश्य,
दिल को भाते .......
और मेरे तनाव उनकी परवाज़ में उड़ जाते ,
एक दिन, एक चिया ज्यादा हिम्मत दिखा गई,
आँगन से उड़, कमरे तक आ गई,
पंखे से टकरा कर, पंख कटा गई,

और मेरी आह! निकल गई ,
दौड़ कर उसके नन्हे मखमली बदन को उठाया मैंने ,
जीवन रक्षा के लिए पानी मंगाया मैंने

इससे पहले कि पानी पिलाने की कोशिश करती,
जिंदगी रूठ गई, मेरे हाथ से पानी की कटोरी छूट गई,
अब आँगन की चिडियों का कलरव भेद रहा था दिल को ..
इन्ही हाथो ने कब्र खोदी थी उसके लिए
फिर उसको पत्ते पर लिटा कर ,
उसके जनाजे को फूलों से सजाया था मैंने,

एक नाकाम कोशिश कि थी जीवन देने कि उसको,
आँखों की नमी, बूँद बनकर गिर पड़ी, उस नन्हे मृत शरीर पर
और वो सदा के लिए दफ़न हो गई ,
उसको दफ़न कर पूरे दिन बिस्तर पर पड़ी रही ,
मै कितनी बेबस , कितनी लाचार,
मौत को जीत न सकी .........
आज उसकी कब्र पर एक दरख्त हैं,
उस दरख्त पर फूल खिलते हैं,
परिंदे आकर कलरव करते हैं ,

भवरे, तितलिया, मंडरा लेते हैं उन फूलों पर
शबनम पत्तियों की प्यास बुझा देती हैं
खुश हूँ मै बहुत .....
जिंदगी फिर मुस्कुरा रही हैं.................