Saturday, September 18, 2010

कच्चे धागों का पक्का रिश्ता

कैसे बनता है कोई रिश्ता ?
मन के कच्चे धागों का
पक्का रिश्ता

खोने-पाने का भय नहीं
बंधन की चाह नहीं

वो नज़र-अंदाज़ करें
तब गुस्सा तो आता है
लेकिन
गिला जैसी कोई बात नहीं

कहीं छूट ना जाये ये डोर
डर तो है लेकिन
अफ़सोस जैसे हालात नहीं

भावों को जता दूं मैं
ऐसे शुष्क भी जज़्बात नहीं

उन्हें जान-पहचान की
खबर तो है
लेकिन
मन की सीलन
का अंदाज़ नहीं

मालूम है! एक दिन
ये शोर थम जाएगा
मन के कच्चे आँगन
पर नया रंग पुत जाएगा

लेकिन जब कभी
फिजा में
स्वर सुनाई दिया तो


हौले से
धड़कने बढ़ जाए शायद
रूह मचल जाए शायद
सन्नाटा पसर जाए शायद
तब

इस बेशर्त रिश्ते पे
किसी टिपण्णी की
कोई दरकार नहीं

-------प्रिया

5 comments:

अनिल कान्त : said...

तुम्हारी कवितायें पढ़ कर अच्छा लगता है

vandana said...

behad behad khoobsoorti se dil ki baat kahi hai yar .....bahut kuch bolna chahti hoon par samjh nahi aa rha ...khair..... vaise to sabse najuk sa ek yahi rishta hota hai lekin jab ham peecha chhudaana chahen or khud hi nakaam ho tab iski majbootiyo par sirf jhunjhlahat hoti hai .....or ham fir aage badh jaate hai ek unkabule sach k saath ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मन कि वेदना को शब्द देती रचना ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

http://charchamanch.blogspot.com/2010/09/17-284.html

संजय भास्कर said...

अहसासों का बहुत अच्छा संयोजन है ॰॰॰॰॰॰ दिल को छूती हैं पंक्तियां ॰॰॰॰ आपकी रचना की तारीफ को शब्दों के धागों में पिरोना मेरे लिये संभव नहीं