Thursday, April 9, 2009



सृजन - ये शब्द सुनते ही दिमाग एक साथ बहुत कुछ सोचने लग जाता हैं! बात उन दिनों की है जब मैं स्कूल में थी , शायद हिन्दी की क्लास में पहली बार ये शब्द सुना था , मलतब नही समझ में आया तो रट लिया, पर वो कहते हैं न वक्त सब कुछ सिखा और समझा देता हैं .......... बस फिर क्या मैं भी समझ गई..........सर्जन अर्थात निर्माण !

ईश्वर ने इस स्रष्टि का सर्जन किया ,पर क्या कोई भी सृजन बिना कल्पना के सम्भव हैं । अगर नही ........ तो स्रष्टि निर्माण के पूर्व विधाता ने एक योजनाबद्ध कल्पना कर दुनिया कि रूपरेखा तैयार की होगी । संभवतः यही हुआ होगा ..........और वैसे भी हम अगर गौर करे तो रोजमर्रा की जिन्दगी में भी तो कार्य को किर्यान्वित करने के पूर्व हम कल्पना ही तो करते हैं ...... बचपन में मैंने ये कविता लिखी थी ...... सोचा तो कुछ ऐसा ही था पर उन दिनों सोंच इतनी परिपक्व नही थी ...........खैर अब प्रस्तुत हैं मेरी रचना "कल्पना"


कल्पना

कल्पना तू क्या हैं, क्या तू एक सपना हैं,
नहीं तू सपना नहीं, वास्तविकता हैं जीवन की ,

अडिग हैं विश्व का ये भार , तुझ पर ही निर्भर समस्त ब्रह्माण्ड ,
पर तुझे न समझ पाया ये मनुष्य ,

यदि तू न होती, तो ये स्रष्टि नहीं होती ,
ये स्रष्टि नहीं होती ,तो मनुष्य नहीं होता,
मनुष्य नहीं होता , तो तू कैसे जीवित रहती,
और आज मेरी कलम तेरे बारे में न लिखती !!


जानती हूँ इतनी छोटी सी रचना का विश्लेषण लम्बा दिया हैं........ पर ये हैं भी तो बालमन की उपलब्धि ........... उम्मीद हैं आप इसे पसंद करेगे --------------- प्रिया चित्रांशी

3 comments:

nilima said...

Priya.. tum accha likhti ho aor accha lagta hai parkar kyon ki tumhari kavita hamesha hakeekat ke kareeb hoti hai apne vicharon ko shabdon me pirona sabko nahi aata. if god has given u this abilty to ise sambhal kar rakhna aor ise nikharne ki hamesha kosis karti rahana...... NILIMA

richa said...

इतने सहेज विचार और सवाल सिर्फ एक बाल मन में ही आ सकते हैं... बहुत सुन्दर है बाल मन की ये "कल्पना"... लिखना तो बहुत कुछ चाहती हूँ पर फिर कभी... अभी बस इस कल्पना को पढ़ के खुश होना चाहती हूँ...

अरुण कुमार झा said...

प्रिय जी
ब्लॉग की सारी रचनाएँ सिर्फ और सिर्फ बेहतरीन और लाज़वाब सबकुछ. शुभ
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