Friday, March 19, 2010

अब निर्णय तुम्हारा है

मेरी ये रचना भारत की उन स्त्रियों के लिए है जो बस बिटियाँ है, बांके की दुल्हन हैं, छुट्टन की अम्मा है कहीं बडकी, मझली, छुटकी है उनके पास खुद का नाम नहीं, कोई पहचान ही नहीं, विरोध उसका स्वभाव ही नहीं, जो कुछ परिवार, समाज से मिला उसको भाग्य मान बैठी (मौन है तो ?क्या लेकिन सब समझती है )...देश ने वोट का अधिकार तो दिया लेकिन सर उठाकर जीने का हौसला नहीं। सोचती हूँ यदि महिला आरक्षण को मंजूरी मिल भी जाए तो क्या उनका भाग्योदय होगा ? या फिर मंत्रियों की पत्नियां और प्रशासनिक अधिकारियों के परिवारों की स्त्रियाँ ही इस का लाभ उठा पाएंगी ....खैर इस विवादित प्रश्न को विराम देते है। मुझे लगता है क़ि बनी बनाई व्यवस्था को बदलने के लिए कानून की नहीं बल्कि वैचारिक क्रांति और नज़रिए में बदलाव की जरूरत होती है.....इस विषय पर फिर कभी .......अभी तो बेनामी में खोई उन तमाम स्त्रियों की अंतर्मन की जुबा को मेरी कलम की तरफ से आवाज़ :-





स्त्री हूँ मैं
हमेशा से कमजोर समझते आये हो मुझको


नवरात्रि में
दुर्गा सप्तशती का पाठ
करते देखा है मैंने
क्यों?
मेरे शक्तिस्वरूपा, तेजस्वी, ओजपूर्ण
रूप से डर गए क्या ?


ओह! तो स्वार्थी हो तुम
पूजते हो क्योंकि -
मुझ दैवीय स्वरुपा की नज़र तिरछी हुई तो
नुक्सान हो सकता है.
अच्छा ! तो बल से डरते हो
मन से छल करते हो


कितने दोगले हो तुम
कितनी बार भावनात्मक खेल खेला है तुमने
राजनीति भी कर लेते हो अक्सर
और तुम्हारी कूटनीति का तो जवाब नहीं



मेरा अंश जो स्वतंत्र है
उसी को छलते हो रोज़
पर नहीं भूलते मेरे दर पर दिया जलाना



क्या लगता है तुमको ?
तुम्हारे घर, परिवार, समाज की स्त्रियाँ
नहीं समझती तुमको -



जब तुम जज़्बातों का छल करते हो
और वो मोहब्बत के पकवान बनाती है
रिश्तों की मजबूती के लिए



जब राजनीति करते हो
तो वो खामोश सी झूठ को परखती है
और आंकलन कर आगे बढ़ जाती है



कूटनीति करते हो
तो धैर्यवान नारी, चतुराई से
हालातों की दिशा बदलती है
देखी को अनदेखी कर
तुम्हारी गर्द झाड
मसरूफ हो जाती है जिंदगी में



बस! अब और नहीं
क्योंकि इतिहास साक्षी है
जितनी भी बार तुमने
ललकारा है स्त्री के धैर्य को
उसके आत्मसम्मान को,
साहस को
लोगों ने सिर्फ खोया है
पाया कुछ नहीं



कहीं लंका ढही
तो कहीं कौरव वध
अब निर्णय तुम्हारा है ॥


" प्रिया चित्रांशी"

घूंघट

Tuesday, March 9, 2010

एहसास खोए जब






लिखने बैठे हैं कुछ आज
बहुत दिनों बाद


सोचते थे
रब्त--ख्यालों के जहाँ से
आवाज़ देंगे एहसासों को
कोई गीत, ग़ज़ल, कविता, नज़्म या रुबाई
दौड़ी चली आयगी...
हमारे दामन में बेनक़ाब हो जाएगी


लेकिन ये क्या ?
दिल--गोशा में कोई जज़्बात ही नही ,
एक सुनहरी तीरगी
और
बाआवाज़ खामोशी के सिवा
कहीं कोई अश्आर ही नही


यक़ीनन!
एहसासों , जज़्बातों की चोरी हो गयी
या फिर
हमारी
ख्यालगाह में बुरी नज़र लग गई।
मुमकिन है!
किस ने टोना किया हो
या फिर
दरबाह बद्दुआ की शिकार हो गई।


लिल्लाह!
कोई तो आए
जो
नज़र उतरे ....
इस मायूसी से हमें उबारें
हमारी क़लम में मंतर फूँके
दिल में एह्सासातों का चश्मा फूट जाए



यकायक!
इस ख्यालात से एक तस्वीर उभरी-
हमने देखा -
कविता हमारे पास नमक लिए खड़ी थी
रुबाई हाथों में राई लेकर आई थी,
ग़ज़ल मौजूद थी तीखी मिर्ची के साथ
गीत ने कुछ लकड़िया सुलगाई थी।


सर से सात बार फेर जो झोंका था आग में
खुदा कसम ज़रा भी गंध ना आई थी


अब नज़र उतर चुकी थी हमारी
क़लम की पैराहन नज़्म बन...
सफो पर छप चुकी थी


एहसासों की दुनिया का ऐसा "सहयोग"
पहली बार महसूस किया था हमने



दरबाह - कलम

Friday, February 19, 2010

हौसला-ए-जिंदगी


जिंदगी का साथ जारी है
एक रहनुमा का इंतज़ार जारी हैं
रास्ते लम्बे लगते है
मुसलसल तलाश जारी है


ठिठक सी गई हूँ वक़्त के तकाज़ों से,
हर तजुर्बे से दोस्ती कर ली
साथ देगा मेरा ये ताउम्र
ये यकीन तो अब भी जारी हैं


जिए जाना फितरत हमारी हैं
कब , क्यों , कहाँ कैसे क्या होगा ,
अब इनको दूंदना आदत हमारी हैं
ढूँढने में वक़्त जाया किया है हमने
अब तो उम्र इन सवालों से हारी हैं


मात का साथ जिंदगी ने छोड़ा कहाँ ,
कमबख्त फतह तक सवाली हैं
तू मुझे आज़मा जिंदगी
मैंने शख्सियत को पोशीदा किया है
खिज़ा के मौसमो में भी बहारो को जिया है



सोचती हूँ जो तू मुझे ढूढती हुई कभी
जाये जो मेरे रूबरू कभी
मैं तकसीम कर लूं खुद को तो
धोखा होगा तुझे सुन जरा जिंदगी


जिंदगी तू तो मेरी बंदिनी है बनी
सोचती है तू अफसुर्दा करके मुझे चलती बनी
सूखे फूलों में खुसबू अब तक महफूज़ है
सूंघ कर उनको मै हँस पड़ी
देख - देख ग़मज़दा हो मै कैसे जी


इंसा हूँ मै कोई खुदा तो नहीं
बना कर मुझे वो भी हैरान है
फिर तेरा क्या हौसला सुन जरा जिंदगी


**********************

अफसुर्दा- दुखी


Tuesday, February 9, 2010

जज़्बातों का रिसेशन


सोचा था
हाँ तब
तू साथ था जब
तू बाती और
मै मोम
या फिर यूँ
मैं मोम
तू बाती बन
एक लौ जलाकर
प्रेम की
रोशन करेंगे
घरौंदा अपना


लेकिन अब
वक़्त बदला और
सोच भी
तू तिजारत की दुनिया की
नामचीन हस्ती
मैं ख्यालों की दुनिया में
खोई हुई सी



तू कतरा-कतरा
जल रहा है
जगमगा रहा है
तप कर कुंदन सा हो गया है
बाज़ार में खूब चल रहा है



मै रफ्ता-रफ्ता पिघल रही हूँ,
मोम जो हूँ....
पिघल कर भी नहीं मिटती
मेरे वजूद पर
तेरा साया जो रहता है



मै न ! पिघल कर
मोम नहीं रहती
पानी हो जाती हूँ
जिधर का रुख करती हूँ
रास्ता मिल जाता है
कोई भी रंग ..
आसानी से चढ़ जाता है



अब न चेहरे पर
भाव नहीं आते
उनको ढाँपने का
गुण जो आ गया है



तेरे तजुर्बे ने
मोम से पानी बना दिया
कई बार बनी हूँ बर्फ सी
लेकिन पिघल कर फिर
मोम हुई पानी नहीं.


शुक्रिया !
शुक्रिया उस साथ का
जिसने
दुनिया के संग
जीना सीखा दिया
मेरा असली रंग चुरा
ज़माने का रंग चढ़ा दिया



कल खबर आई थी तेरी दुनिया से
सेंसेक्स की उथल-पुथल की
चेहरा भी देखा था टी. वी. पर
आते-जाते रंगों को पढ़ लिया मैंने



सच! तुमने कुछ नहीं सीखा
फिर भी ख़बरों में रहते हो ज़माने की


एक सवाल पूछना था तुमसे
हाँ ! तुम्हारी भाषा में


गर जज़्बात में रिसेशन हो ........
तब क्या प्रोडक्ट ब्रांड बन जाता है?


Monday, February 1, 2010

कुछ ग्लोबलाइज़ लहरें

(ये रचना मेरे लिए ख़ास है ...उलझे दिमाग की सुलझी उपज है। उलझन की स्थिति शायद मस्तिष्क की सबसे उपजाऊ अवस्था होती है। ये रचना व्यक्ति से शुरू होकर, सामाजिक ताने बाने से गुजरती हुई वैश्विक होती है तथा भविष्य की परिकल्पना पर विराम लेती है. सिर्फ इतना अनुरोध है ...थोड़ी बड़ी रचना है इसे पूरा पढ़े और पढ़कर ही प्रतिक्रिया करें.....क्योंकि आप की राय मेरे लिए अमूल्य है। )


कल समंदर के साहिल पर
टहलते हुए एक मौज टकराई
अकेली नहीं आई
कुछ सवाल लाई
मैंने नज़रे चुरानी चाही
उसने लपक कर
पांवो को जकड लिया

पूछा, कैद करना चाहती हो ?
बोली नहीं, तुम्हारे चरणों का स्पर्श




मै मुस्कुराई
इत्मीनान से साहिल पर भीग जवाब देने ही वाली थी
के दूसरी मौज ने इशारा किया
लड़खड़ाती जुबा संभल कर कहा
आज नहीं फिर कभी -
मौज समंदर में वापस लौट गई




तन्हा जान दूजी आई
बोली, तू ये क्या करने वाली थी
हाल-ए-दिल गाने वाली थी
तू नहीं जानती ------
लहरे कभी कोई बात कहाँ पचा पाती है
वापस आकर साहिल पर ही तो फेंक जाती है
मैंने कहा -
तू क्यों ये सब कहती है
अपने कुनबे से ही गद्दारी करती है
क्यूं करूँ मैं तुझ पर भरोसा ?
हे राम !
क्या अब नीर से भी मिलगा धोखा ?




लहर मेरे तन से लिपट बोली
तूने मुझे पहचाने में किया धोखा
दरअसल मैं तेरा ही हिस्सा है



बरसो साहिल पे बैठ के तूने जो अश्क बहाए है
उन नन्ही बूंदों ने समुद्री मौजो के नखरे उठाये है
आज मैंने समुद्री मौजो से बगावत की है
तेरे अश्रु आज लहर बन तेरे सामने आये है।




इत्फाकन आज मैं अकेली हूँ
तेरा अपना हिस्सा हूँ
तेरी ही सहेली हूँ
कैसे न रोकती तुझे बोलने से --

तुमको लगता है समंदर की दुनिया अलग होती है
इंसानी दुनिया से बिल्कुल जुदा होती है
मैं तो अब इस दुनिया का ही हिस्सा हूँ
इसीलिए तो कहती हूँ
यहाँ भी फितरत आदमियत सी होती है।




अल्लाह बड़ा कारसाज़ है
शक्ले अलग देता है
आदतें वही देता हैं
तुम्हारा दर्द बांटने से कम नहीं होगा
ग्लोबल हो जायेगा


हिंद महासागर, प्रशांत महासागर से मिल जायेगा
कौन जाने कल ये दर्द अंतर्राष्ट्रीय हो जायेगा
यू.एन.ओ. बेबस नज़रो से ताकेगा
कोई चारटअर्ड शेल्फ की धूल चाटेगा
हमेशा की तरह पैसा और ताकत जीत जायेगा।



खामोश रहकर नादानियों से सीख लो
हालात चाहे कितने बदहाल क्यों न हो जाए
यू सारे आम नीलाम न करो
अपनी ख़ास पीड़ा को ऐसे आम न करो
खुद को संधि के नाम पर बदनाम न करो।




कौटिल्य से कुछ नहीं सिखा तुमने -
पलट कर देखो एक बार
बन जाएगी फिर नई बात
चौसर का खेल तो तुमने ही सिखाया है
सुना तो ये भी है के शून्य भी तुमने बनाया है।




तो फिर
अश्को की लेकर धराये
पोटली में कुछ आशाएं
उपलब्ध संसाधन
विचारो और ईमान की प्रत्यंचाए
तकनीकी गांडीव की प्रबल टनकारे
एक लक्ष्य, एक सांस
अचूक निशाना
अचूक वार


चलो कूच करो २२ वी सदी की ओर
इस "अबला "को अब " बला" बनने से कौन रोक पायेगा ?