Monday, February 21, 2011

एक शाम कुछ यूँ हुआ

एक शाम कुछ यूँ हुआ
कायनात उलट सी गई,
फलक समंदर में
तब्दील होने लगा


बादल लहरों के माफिक
दौड़ -दौड़ साहिल तलाशने लगे
ज्वार-भाटे के गर्जन .....
आकाश में गश्त करने लगे
धरती की कश्ती में सिक्का फेंक
सूरज लुटने ही वाला था
के
चाँद ने आकर बाजी पलट दी


(ना जाने कितनो की बालाएं अपने सर लेगा
ये चाँद
)


आसमां ठहर गया
सागर नहीं बना,
धरती भी अपनी जगह कायम
पाताल होने से बच गई


अब के बार  कुदरती
प्यादों ने कोई साजिश की तो
कसम से !
ए खुदा सुन !
क़यामत तेरे घर होगी


समझा दे अपनी कुदरत को
हम खुदाबन्द ..
इन्साफपरस्त लोग हैं
अदालत ज़मी पे बैठेगी
पेशी भी यहीं पड़ेगी
सिर्फ तारीखे मिलेंगी
लगाना फिर चक्कर  पे चक्कर


बहरहाल !
केस फाइल नहीं किया है
मामला मुल्तवी हुआ...
बर्खास्त नहीं
ऑन रिकॉर्ड ना सही
ऑफ रिकॉर्ड है

एक और  बात -
सिर्फ तुम ही नहीं रखते बही खाता
फाइल री-ओपन यहाँ भी होती हैं
और सेटेलमेंट भी
  करो अब चुनाव
क्या चाहते हो ?



Monday, January 17, 2011

राय

बातें ज़ुबा पे आ
अक्सर रुक जाया करती हैं|

जो नही कहना होता है
वो सब कह जाया करती हैं|

आज मैं वो सारी आदतें अपनी
ताक पर रख आई हूँ|

आज ना झुकेंगी मेरी पलकें
नही लड़खड़ाएगी ज़ुबां
आज ना सहमूँगी मैं
नही बदलूँगी बात का विषय
ना समेटूंगी खुद को अपनी ही ज़द में|

इंतेज़ार कर रही थी के तुम ही बोलोगे 
मेरी हदे जानते हो तो मुह खोलोगे
लेकिन नही किया तुमने वैसा
मैने सोचा था जैसा|

तो सुनो
हाँ! हाँ!अच्छे लगते हो मुझे
प्यार करने लगी हूँ मै तुम्हे
तुम्हे कोई ऐतराज़ तो  बोलो ?

लेकिन
पहले सुन लो बात मेरी
इनकार किया तो भी रोक नही पाओगे
समझाओगे तो हार जाओगे
बाधा समझते  हो राह की ...
हमेशा पुल जैसा ही पाओगे

ऐसा ही कुछ कहा होगा ना
राधा ने श्याम से ?


एक कथानक तैयार कर रही थी
तुम्हारी राय लेने आई हूँ
ये विअर्ड फेशिअल इक्स्प्रेशन देना बंद करो

कुछ बोलोगे ?
या मै जाऊं ?


अच्छा सुनो !
पेपर्स  मेज  पर छोड़ जा रही हूँ
जब नोर्मल होना तो पढ़ लेना
रिंग कर दोगे तो आ जाऊंगी 
डिशकशन के लिए

अजीब बन्दा है!
देखते ही ब्लैन्क हो जाता है
कोई और तो नहीं होता ?



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चलते चलते एक शेर भी कहते चले ---


"मै तुझे चाहूं या ना चाहूं मेरी मर्जी ,
मेरी चाहत तेरी मिल्कियत  नहीं जानां"

Wednesday, December 22, 2010

उम्र

ये ना कहना कभी
के मैंने तुम्हे
तन्हा छोड़ा

याद है साथ चलते चलते
राह में अक्सर
मैं रुक जाया करता था
तो
तुम नाराज़ हो जाए करती थी


हर कदम पर मैने
ना जाने कितनी नज्में बोई हैं
हर नज़्म हाथ थामेगी


कुछ डेलिकेट हैं
कुछ गबरू ज़वान सी
कुछ शज़र का रूप ले चुकी होंगी अब तक
कुछ नज्में उम्मीद से भी हो शायद


ये माथे पर शिकन और लबों पे मुस्कुराहट
बात पूरी होने दो
फिर पोज़ देना


दरअसल वो नज्में नही है
जीरोक्स करके रखी है उम्र मैने

ज़ज़्बातों को छोड़ो
प्रॅक्टिकली सोचो
तो अब इस से ज़्यादा
मै
क्या दे सकता हूँ तुम्हे?


रोना मत
तुम्हारे आंसुओं से
ये चायनीज़ प्लांट भी नही फलने वाला


जानती नही क्या
आंसुओं में सॉल्ट होता है
औ मिट्टी में नमक हो तो प्लांट
मुरझा जाता है

हमारे रिश्ते में नमक ज़्यादा था शायद

चाय में चीनी कितनी लोगी ?
ओह! तुम तो विदाउट शुगर लेती हो

Saturday, December 18, 2010

रिप्लेस

रोज़ रोज़ बात करूँ भी तो क्या ?
बस यही सोच चुप हूँ
हिचकियाँ नहीं आती मुझे
टेलीपैथी भी गई काम से
तुम्हे स्पेस चाहिए था ना
लो दिया मैंने
उम्र भर का स्पेस

एक बार वापस आ
देखना ज़रूर
तुम्हे किसने रिप्लेस किया है ?

Wednesday, December 15, 2010

आदमी सा वक्त

कितनी छिछली और सतही होती हैं
दीवारे वक़्त की
कभी उनमें कैद रुका सा आदमी
कभी बहता आदमी
  

देखा तो होगा तुमने
दीवारों पे उड़ता आदमी
आदमी के मायने वक़्त है
या वक़्त के मायने आदमी 

दगाबाज़ वक़्त या आदमी
मानो  न मानो
ये वक़्त आदमी से कमतर नहीं