Saturday, September 18, 2010

कच्चे धागों का पक्का रिश्ता

कैसे बनता है कोई रिश्ता ?
मन के कच्चे धागों का
पक्का रिश्ता

खोने-पाने का भय नहीं
बंधन की चाह नहीं

वो नज़र-अंदाज़ करें
तब गुस्सा तो आता है
लेकिन
गिला जैसी कोई बात नहीं

कहीं छूट ना जाये ये डोर
डर तो है लेकिन
अफ़सोस जैसे हालात नहीं

भावों को जता दूं मैं
ऐसे शुष्क भी जज़्बात नहीं

उन्हें जान-पहचान की
खबर तो है
लेकिन
मन की सीलन
का अंदाज़ नहीं

मालूम है! एक दिन
ये शोर थम जाएगा
मन के कच्चे आँगन
पर नया रंग पुत जाएगा

लेकिन जब कभी
फिजा में
स्वर सुनाई दिया तो


हौले से
धड़कने बढ़ जाए शायद
रूह मचल जाए शायद
सन्नाटा पसर जाए शायद
तब

इस बेशर्त रिश्ते पे
किसी टिपण्णी की
कोई दरकार नहीं

-------प्रिया

Friday, September 3, 2010

काश! मैं लड़का हो जाऊं


काश के मैं लड़का हो जाऊं
फिर समझूं
ये दादागिरी टाइप चीज़ क्या होती है
बिन निमंत्रण दावत उड़ाने का क्या मज़ा है
बिन गिफ्ट पार्टी में शिरकत से क्या फील होता है
बियेअर, वाइन, व्हिस्की रम
इसके साथ वीकेण का क्या मज़ा है


अबे, साले,अमा यार, कमीने जैसे शब्द मेरे लहजे में हो
दोस्तों से उधार ले ना चुका पाने का एक रुतबा
किसी ढाबे पे बिन पेमेंट खाना खाने का आनंद
वो सिगरेट के कश के साथ सारे डिशकशन
ये कैसी अनुभूति देते हैं ?




लड़की को देख दिल का लडखडाना,
गर्ल्स कॉलेज और हॉस्टल के सामने
पूरा दिन बिताना
वो बेमतलब लड़कियों का पीछा कर
मीलों की दूरी तय करना
किस तरह का अचीवमेंट है ?




बिन सूचना दिए घर से कहीं भी चले जाना
वो देर रात वापस आना
वो माँ का टोकना
पापा का मारने के लिए दौड़ना
बहन का बचाना
फिर झूठे बहाने बनाना
सुबह उठ सब भूल भाल
पुराने धंधे में लग जाना
काश! मैं लड़का हो जाऊं
तो जानू इसका मज़ा क्या है?


स्पाइकी हेअर,स्टाइलिश लुक
माल्स में रश
बाईक में गर्ल फ्रेंड
उधार की गाडी
वो ठीक दस बजे वापसी की ज़िम्मेदारी
रिजर्व में पेट्रोल
जेब में पैसे गोल
पैदल गाड़ी की ढुलाई
लौटाते वक़्त दुश्मन दोस्त
की प्रेम भरी धुनाई





साला! बेवजह एक लड़की के खातिर
फजीहत उठाई
यार! लेकिन इम्प्रेशन बन गया इस बार
नेक्स्ट वीक डेट पर आने को तैयार है
केलेंडर में वो दिन तो बड़ा ख़ास है
काश! मैं लड़का हो जाऊं तो जानू
ये कैसा सुख है ?



इनमें से कुछ नहीं किया मैंने
उठने बैठने का सलीका,
जुबां में तहजीब
आने -जाने की इजाजत
हर फैसले में हिस्सेदारी
आखिर कुछ तो सीखो जिम्मेवारी


तुम पर भरोसा है बेटा
लेकिन ये दुनिया बहुत बुरी है
और मेरी गुडिया सीधी बड़ी है
बस इसलिए तो टोकते हैं
तेरा भला सोचते हैं
इसलिए तो रोकते हैं .



सोचती हूँ शादी के बाद ही कुछ कर गुजरूँ
आजा रे कन्हया तोहे राधा बनाऊ के तर्ज़ पर
पति देव को क्यों ना लड़की बनाऊं
और खुद लड़का बन
उन्हें भी लड़की होने के मजे बताऊँ :-)


( नोट :- मेरी इस रचना का उद्देश्य लड़की Vs लड़का जैसी किसी भी जंग झेड़ने का नहीं है, हमने लिख कर आनंद लिया....आप पढ़ कर आनंद लीजिये )
तेरे  जाने का सबब मालूम नहीं
आने की भी वजह कहाँ थी कोई
आज बहुत याद आये तुम
सोचती रही
क्यों किया ऐसा ?
कोई गलती बताते मेरी
गुस्सा करते,
चीखते, चिल्लाते, झगड़ते
इल्ज़ाम लगाते
बिन आहट  चले गए 
दबे पाँव

अलमारी खोली
फाइल निकाली
वो नन्ही सी डायरी ...
जिसमें सिर्फ एक निशानी है तुम्हारी
तुम्हारा नाम
 अपने ही हाथो से लिखा था तुमने
उन अक्षरों को बार-बार छु
तुम्हे मौजूदगी को महसूस किया मैंने 
अब इस बात पर तो कोई ऐतराज़ नहीं ना ?

,

Tuesday, July 27, 2010

लड़ाई के बहाने





बहुत दिन हो गए हैं
झगडा किये उससे
ढूढता रहता हूँ
लड़ाई के बहाने अक्सर



सुबह ही टी-सेट का नया कप तोडा,
गीला तौलिया बिस्तर पर छोड़ा,
बाथरूम में साबुन का झाग फैलाया,
पोंछे के वक़्त चप्पल के साथ अंदर आया,
गार्डनिंग के बहाने गमला तोडा,
टेस्टी ब्रेकफास्ट प्लेट में आधा छोड़ा



दोपहर के खाने पर भी मुहं बिचकाया
कमरे में उसके घुसते ही
रिमोट पर हाथ अजमाया

इतने पर भी वो कुछ नहीं बोली
स्टाइल से पूछा " एवरीथिंग इस नोर्मल





तुम्हारे टाइप की बनाने की कोशिश कर रही हूँ
चहकती रहती हूँ ना दिनभर
संजीदा रहकर बुद्धिमान बन रही हूँ
मेरी बक-बक से तुम्हारा दिन ख़राब होता है ना
आज खामोश रहकर तुम्हारा साथ दे रही हूँ



ओहो! तो ये एक हफ्ते पुरानी कहानी है
इसी वास्ते रूठी-रूठी सी मेरी रानी हैं
सोचता हूँ ..इगो परे कर कह ही दूं
के ये बदलाव मुझे अच्छा नहीं लगता
तेरे गुस्से, बिन घर, घर नहीं लगता
औ डांट बिन सन्डे, सन्डे नहीं लगता



शाम साथ में आउटइंग का प्लान करता हूँ
वापस आकार फिर से लड़ता हूँ
सच्ची! कितने दिन हो गए हैं दोस्तों !
उसके गुस्से की बरसात से भीगा नहीं हूँ मैं



" प्रिया "

Friday, July 16, 2010

संभाल लो मुझे



भीड़ सी मेरे आस-पास चलती रहती है
तन्हाई मुस्कराहट का लिबास ओढ़े खड़ी रहती है
एक बाज़ार सा माहौल है मेरी दुनिया में
जहाँ सब कुछ बिकता है


एक दूकान तो मेरे अन्दर भी खुल रही है
कोई झुन्झुलाहट या झल्लाहट पनप रही है
किसे बेचू ? कौन खरीदेगा ये सब ?
मोल-भाव में अभी कच्ची हूँ .




मेरे ख्वाइशों की परवाह कौन करता हैं
यहाँ तो ख्वाबों का भी दाम लगता है
फिर भी मन के किसी कोने में
एक उम्मीद जल रही है


वो आये आके थाम ले मुझे,
तलाश ले वो, जो मेरा वली है


इससे पहले के मेरा ज़मीर लुट जाए
जहन मैला हो जाए
संभाल लो मुझे.
"प्रिया "