सोचती हूँ
आज डूबने न दू सूरज को
साँझ साथ न काटूँगी
आज की रात
मैं तेरे खातिर
अपना घर , परिवार
सहेलियां, बचपन सब
त्यागने वाली हूँ
तू मेरे खातिर
एक रात नहीं ठहर सकता?
ज्यादा से ज्यादा क्या होगा ?
लोग कहेंगे
एक बार सूरज ही नहीं डूबा
चाँद ही नही निकला,
सितारे नही चमके आसमां पर
कुछ अध्यात्म से जोड़ेंगे
कुछ वैज्ञानिक रहस्य टटोलेंगे
फिर चर्चाओ का बाज़ार गर्म होगा
तुझ पर नया शोध होगा
ज्योतिषो की दुकान चल निकलेगी
बस ग्रहो के चाल बदलेगी
नाम तो है ही तुम्हारा
और प्रसिद्धी मिल जायेगी
मेरी बात जो मानोगे
तो चैनल्स को भी टी०आर०पी० मिल जाएगी
मैं जो कल थी
वही रह जाऊंगी
जननी तो स्रष्टी ने ही बनाया
तुम गर चाह लो तो .........
नियंत्रिका भी कहलाऊंगी
एक बार नैसर्गिक नियम तोड़ कर देखो ना
थोडा सा जोखिम लेकर देखो ना
तुम पुरुष हो और मैं प्रकृति
हम दोनो एक दूजे से ही है
तो फिर
मेरी बात मानने से इनकार क्यों ?
सुनो ना!
रुक जाओ
हमेशा तो सोचते हो
ब्रहमांड के बारे में
आज मेरे और अपने खातिर
अंधेरे को रोशन कर दो
चौबीस घंटो का उजाला कर दो
वो भेड़ चाल कब तक चलोगे?
कुछ नया प्रयोग करके देखो ना
ना डूबो आज पश्चिम में
एक रात तो धूप खिलाकर देखो ना
"प्रिया"