Tuesday, February 9, 2010

जज़्बातों का रिसेशन


सोचा था
हाँ तब
तू साथ था जब
तू बाती और
मै मोम
या फिर यूँ
मैं मोम
तू बाती बन
एक लौ जलाकर
प्रेम की
रोशन करेंगे
घरौंदा अपना


लेकिन अब
वक़्त बदला और
सोच भी
तू तिजारत की दुनिया की
नामचीन हस्ती
मैं ख्यालों की दुनिया में
खोई हुई सी



तू कतरा-कतरा
जल रहा है
जगमगा रहा है
तप कर कुंदन सा हो गया है
बाज़ार में खूब चल रहा है



मै रफ्ता-रफ्ता पिघल रही हूँ,
मोम जो हूँ....
पिघल कर भी नहीं मिटती
मेरे वजूद पर
तेरा साया जो रहता है



मै न ! पिघल कर
मोम नहीं रहती
पानी हो जाती हूँ
जिधर का रुख करती हूँ
रास्ता मिल जाता है
कोई भी रंग ..
आसानी से चढ़ जाता है



अब न चेहरे पर
भाव नहीं आते
उनको ढाँपने का
गुण जो आ गया है



तेरे तजुर्बे ने
मोम से पानी बना दिया
कई बार बनी हूँ बर्फ सी
लेकिन पिघल कर फिर
मोम हुई पानी नहीं.


शुक्रिया !
शुक्रिया उस साथ का
जिसने
दुनिया के संग
जीना सीखा दिया
मेरा असली रंग चुरा
ज़माने का रंग चढ़ा दिया



कल खबर आई थी तेरी दुनिया से
सेंसेक्स की उथल-पुथल की
चेहरा भी देखा था टी. वी. पर
आते-जाते रंगों को पढ़ लिया मैंने



सच! तुमने कुछ नहीं सीखा
फिर भी ख़बरों में रहते हो ज़माने की


एक सवाल पूछना था तुमसे
हाँ ! तुम्हारी भाषा में


गर जज़्बात में रिसेशन हो ........
तब क्या प्रोडक्ट ब्रांड बन जाता है?


Monday, February 1, 2010

कुछ ग्लोबलाइज़ लहरें

(ये रचना मेरे लिए ख़ास है ...उलझे दिमाग की सुलझी उपज है। उलझन की स्थिति शायद मस्तिष्क की सबसे उपजाऊ अवस्था होती है। ये रचना व्यक्ति से शुरू होकर, सामाजिक ताने बाने से गुजरती हुई वैश्विक होती है तथा भविष्य की परिकल्पना पर विराम लेती है. सिर्फ इतना अनुरोध है ...थोड़ी बड़ी रचना है इसे पूरा पढ़े और पढ़कर ही प्रतिक्रिया करें.....क्योंकि आप की राय मेरे लिए अमूल्य है। )


कल समंदर के साहिल पर
टहलते हुए एक मौज टकराई
अकेली नहीं आई
कुछ सवाल लाई
मैंने नज़रे चुरानी चाही
उसने लपक कर
पांवो को जकड लिया

पूछा, कैद करना चाहती हो ?
बोली नहीं, तुम्हारे चरणों का स्पर्श




मै मुस्कुराई
इत्मीनान से साहिल पर भीग जवाब देने ही वाली थी
के दूसरी मौज ने इशारा किया
लड़खड़ाती जुबा संभल कर कहा
आज नहीं फिर कभी -
मौज समंदर में वापस लौट गई




तन्हा जान दूजी आई
बोली, तू ये क्या करने वाली थी
हाल-ए-दिल गाने वाली थी
तू नहीं जानती ------
लहरे कभी कोई बात कहाँ पचा पाती है
वापस आकर साहिल पर ही तो फेंक जाती है
मैंने कहा -
तू क्यों ये सब कहती है
अपने कुनबे से ही गद्दारी करती है
क्यूं करूँ मैं तुझ पर भरोसा ?
हे राम !
क्या अब नीर से भी मिलगा धोखा ?




लहर मेरे तन से लिपट बोली
तूने मुझे पहचाने में किया धोखा
दरअसल मैं तेरा ही हिस्सा है



बरसो साहिल पे बैठ के तूने जो अश्क बहाए है
उन नन्ही बूंदों ने समुद्री मौजो के नखरे उठाये है
आज मैंने समुद्री मौजो से बगावत की है
तेरे अश्रु आज लहर बन तेरे सामने आये है।




इत्फाकन आज मैं अकेली हूँ
तेरा अपना हिस्सा हूँ
तेरी ही सहेली हूँ
कैसे न रोकती तुझे बोलने से --

तुमको लगता है समंदर की दुनिया अलग होती है
इंसानी दुनिया से बिल्कुल जुदा होती है
मैं तो अब इस दुनिया का ही हिस्सा हूँ
इसीलिए तो कहती हूँ
यहाँ भी फितरत आदमियत सी होती है।




अल्लाह बड़ा कारसाज़ है
शक्ले अलग देता है
आदतें वही देता हैं
तुम्हारा दर्द बांटने से कम नहीं होगा
ग्लोबल हो जायेगा


हिंद महासागर, प्रशांत महासागर से मिल जायेगा
कौन जाने कल ये दर्द अंतर्राष्ट्रीय हो जायेगा
यू.एन.ओ. बेबस नज़रो से ताकेगा
कोई चारटअर्ड शेल्फ की धूल चाटेगा
हमेशा की तरह पैसा और ताकत जीत जायेगा।



खामोश रहकर नादानियों से सीख लो
हालात चाहे कितने बदहाल क्यों न हो जाए
यू सारे आम नीलाम न करो
अपनी ख़ास पीड़ा को ऐसे आम न करो
खुद को संधि के नाम पर बदनाम न करो।




कौटिल्य से कुछ नहीं सिखा तुमने -
पलट कर देखो एक बार
बन जाएगी फिर नई बात
चौसर का खेल तो तुमने ही सिखाया है
सुना तो ये भी है के शून्य भी तुमने बनाया है।




तो फिर
अश्को की लेकर धराये
पोटली में कुछ आशाएं
उपलब्ध संसाधन
विचारो और ईमान की प्रत्यंचाए
तकनीकी गांडीव की प्रबल टनकारे
एक लक्ष्य, एक सांस
अचूक निशाना
अचूक वार


चलो कूच करो २२ वी सदी की ओर
इस "अबला "को अब " बला" बनने से कौन रोक पायेगा ?


Monday, January 18, 2010

जिंदगी-रफ़्तार


ये तेज़ रफ़्तार जिंदगी
गर ठहरी है
तो और भी तेज़
रोजमर्रा का स्ट्रेस फेक्टर हो जैसे



ऐसे कई अजनबी
आते है करीब
चलते है साथ
हमख्याल हो न हो
हमकदम हो जैसे



सड़क किनारे बैठे तोते वाले ज्योतिषी ने बताया
Short Time Relationship का योग है
व्यक्ति का नहीं ग्रहों का दोष है
जैसे मिले थे वैसे ही बिछड़ जायेंगे




मन में सोचा ग्रहों को दोष देता है
वक़्त की डिमांड और
इंसानी फितरत को
तोते से तोलता है



शुक्र है उन सोशल websites का
जो जरिया बनी है नजदीकियों के एहसास का



Personal हो या Professional
exchange factor matter करता है
cute and neutral रवैया
हर ज़गह काम करता है



कुछ लोग बेवजह ही ping करते है
बेमतलब Hey, Hi, Hello करते है
मैं नहीं कहती - लोग कहते है
ऐसे लोग काम कम करते है
free इन्टरनेट usage में विश्वास करते है



कुछ दिल के रिश्ते
बनने से पहले ही टूट जाते है
डेटिंग की नौबत आने तक
जेंडर बदल जाते है


कोई कुछ भी कहे
रिश्ते चल रहे है
निभाए जा रहे है
Electronic युग में
Technically बनाये जा रहे है


इन सबके साथ
कदमताल करती
पता नहीं - न जाने क्यों
मै ये सोचू ------
मैं इंसानों से मिलती हूँ
या मौसमो से




Saturday, January 9, 2010

बस यूँ ही टेंस हो जाया करती हूँ

आदाब! खुशामदीद! खैरमकदम! आप सभी का ........उत्तर भारत में इस कड़ाके की सर्दी में अगर गर्मजोशी से स्वागत नहीं किया तो क्या किया ब्लोवेर में हाथ गर्म कर, दोनों हथेलियों को आपस में रगड़ कर और साथ में फूं -फूं कर हाथ इस लायक तो हो चुके है कि keyboard पर डांस कर सके तो हम तैयार है अपने एक अंदाज़ से आपको मिलवाने shhhhhhhhhhhh...... Top Secret हैं Disclose मत करियेगा किसी से :-)




लोग कहते हैं
बहुत शांत हूँ मै
लेकिन
पता है मुझे
गुस्सा रहता है
मेरी नाक पर


सब पर नहीं गुस्साती
उन्ही से रूठी हूँ अब तक
जिन्हें कुदरत ने दिया है
या फिर उनसे ,
जिन्हें
मैंने भीड़ से चुना है



कई बार लगता है
हम सब समझते हैं
एक दूजे को
अच्छी तरह से
या फिर
थोड़ी नासमझी
के साथ




कुछ पल
या फिर
एक दो दिन
तक होती है नाराज़गी



बहुत बार बोला है----
आगे से नहीं करूंगी
"सॉरी "
कई बार नहीं भी कहती
मेरी हर हरकत से वाकिफ हैं
वो सारे
और मैं उनके हर अंदाज़ से




ये Ego का कांसेप्ट भी
आता - जाता रहता है
कोई भी पहल कर
दफ़न करता है
अपना अहम्
और मामला रफा -दफा



बरसती है
प्यार की फुहार
रिश्तो पर
और गुस्सा
छूमंतर




सोचती हूँ
जिंदगी इसी तरह
चलती रहे तो बेहतर है
एक mutal understading
अपने आप बन गई




विश्वास , प्रेम ,
ईमानदारी अभिमान,
मान ,सम्मान
आत्मसम्मान
स्वाभिमान
हक और फ़र्ज़
सारे तत्व संतुलित है
सलामत है
कोई डिफेक्ट नहीं



फिर शिकायत क्यों ?
कोई शिकायत नहीं
सब ठीक- ठाक ही चल रहा है



मैं भी
बेबात - बेवजह
बस यूँ ही
टेंस हो जाया
करती हूँ


Monday, December 21, 2009

" एक तर्जुमा मेरा भी "


लखनऊ की
तंग
गलियों से गुज़रते हुए
दो शोहदों को
अदब
से लड़ते देखा जब
तो उनकी इस तकरार पर
प्यार आ गया।



उनका तर्जुमा
कितना
सच्चा
रवाँ
रवाँ सा था
वरना
इस जहाँ में
सच तो सिर्फ़ एक लफ्ज़ है
और झूठ कारोबार,
एक खोखली बुनियाद के साथ।



शायद !
इसी वजह से हर साल...
इमारते ढह जया करती है ईंटो की ...
और रिश्तो की भी.....
अजीब है! दोनो सूरतों में
आँखें ही नम होती है
दिल नही




"प्रिया चित्रांशी "

चित्र : गूगल से