Thursday, May 12, 2011

इल्जाम



हमें नहीं लिखना रेत पर तुम्हारा नाम
हमें नहीं रखना दिल में तुम्हारा अक्स
हमें  नहीं बैठाना तुम्हे पलकों पर
हम हाथ की लकीरों में भी नहीं चाहते तुम्हे
कसम से! दुआओं में भी कभी नहीं माँगा तुम्हे
कोई रस्म नहीं निभाई इखलाक की
दूसरों से क्या...
 खुद से भी जिक्र नहीं किया कभी तुम्हारा
अम्मी कहती हैं अच्छा करो तो अच्छा होता है
इस बाइस अडचनों पे खड़े हो जाते हैं साथ में





अपना ही भला करते हैं हम
दिमाग से करते हैं काम हम
दिल-विल में विश्वास नहीं करते
गोया बड़े शातिर, चालक और  खुदगर्ज़ हैं हम
हमें मासूम समझने की  गलती  ना  करना

16 comments:

Er. सत्यम शिवम said...

बहुत ही सुंदर भावों से भरी रचना..लाजवाब।

रश्मि प्रभा... said...

itna gussa ?

संजय भास्कर said...

अद्भुत सुन्दर रचना! आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अब ये पढ़ कर तो कोई गल्ती नहीं करेगा .... खूबसूरती से लिखे एहसास

mridula pradhan said...

kuch alag si par achchi lagi.

Suraj said...

itni imaandaari kahan dekhne ko milti hai aajkal..bahut khoob

रचना दीक्षित said...

ये तो गज़ब का ऐलान कर दिया आज. जुबाँ कुछ कहती है और दिल कुछ और, अजीब कशमकश की दास्तान प्रस्तुत की है. बहुत बधाई.

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

priya ji...
har baar ki tarah is baad bhi aapne gehri rachna likhi hai ki kya kahoon....aapne dil mein aisee jagah banaayee hai apni rachnaao ke thru ke tareef karna bhi chhota lagta hai...
aafareen rachnaa.!!!!

प्रिया said...

ब्लोगर की प्रोब्लम के करण सारे कमेन्ट डिलीट हो गए.....हमने नहीं किया....इसलिए जिनके नाम याद संगीता जी, रश्मि मैम, रचना जी और भी कुछ लोग ...आप सब नाराज़ ना होइएगा हमसे.....हमने नहीं किया...वो कोई टेक्नीकल फाल्ट था

प्रिया said...

n Surendra....aap to hamesh hamari bahut tareef karte hain...aap bhi kam achcha nahi likhte...lekin jhooti hi sahi tareef kise pasand nahi :-)

Dinesh pareek said...

बहुत ही सुन्दर लिखा है अपने इस मैं कमी निकलना मेरे बस की बात नहीं है क्यों की मैं तो खुद १ नया ब्लोगर हु
बहुत दिनों से मैं ब्लॉग पे आया हु और फिर इसका मुझे खामियाजा भी भुगतना पड़ा क्यों की जब मैं खुद किसी के ब्लॉग पे नहीं गया तो दुसरे बंधू क्यों आयें गे इस के लिए मैं आप सब भाइयो और बहनों से माफ़ी मागता हु मेरे नहीं आने की भी १ वजह ये रही थी की ३१ मार्च के कुछ काम में में व्यस्त होने की वजह से नहीं आ पाया
पर मैने अपने ब्लॉग पे बहुत सायरी पोस्ट पे पहले ही कर दी थी लेकिन आप भाइयो का सहयोग नहीं मिल पाने की वजह से मैं थोरा दुखी जरुर हुआ हु
धन्यवाद्
दिनेश पारीक
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/
http://vangaydinesh.blogspot.com/

Dinesh pareek said...
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Sachin Malhotra said...

बहुत ही बढ़िया !
कर रही है बात "प्रिया" उन सिलसिलों की जो दिल से शुरू होते हैं
फिर चेहरे पर उभर आते हैं और नैनो से आँसू बन बह जाते हैं

मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है : Blind Devotion

Richa P Madhwani said...

बहुत ही बढ़िया

Vivek Jain said...

वाह,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

BrijmohanShrivastava said...

शीर्षक अच्छा दिया है। और अन्त भी रचना का सारबात से किया है कि हमें मासूम न समझना । सुन्दर रचना