Saturday, December 18, 2010

रिप्लेस

रोज़ रोज़ बात करूँ भी तो क्या ?
बस यही सोच चुप हूँ
हिचकियाँ नहीं आती मुझे
टेलीपैथी भी गई काम से
तुम्हे स्पेस चाहिए था ना
लो दिया मैंने
उम्र भर का स्पेस

एक बार वापस आ
देखना ज़रूर
तुम्हे किसने रिप्लेस किया है ?

18 comments:

सागर said...

यह तो हद है ! ज्ञान विज्ञान के साथ कविता लिखी जा रही है... गोया के तकनीक भी जुड़ गया है... ज्यादा कहना कहीं ऊपर के भावो तो तिरस्कार करना तो नहीं होगा ना ? यही सोच कर चुप रह जाने को मन करता है.

Kailash C Sharma said...

बहुत सुन्दर कटाक्ष..कुछ पंक्तियों में ही बहुत कुछ कह दिया

देवेश प्रताप said...

lajwaab rachna .....

vandana said...

bahut sunder yaaar :).har kisi ko karj chukana hota hai ..kabhi jaldi kabhi der se ..sayad janmo ki deri :) .

richa said...

रिश्तों में एटिट्यूड... हम्म... ये अच्छी बात नहीं है ( अटल जी के अंदाज़ में ) :)

रश्मि प्रभा... said...

hmmm ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

स्पेस के लिए रिप्लेस ही कर दिया ...

अपना अपना नजरिया है ..

दिगम्बर नासवा said...

स्पेस में किसी को रिपेस कर दिया ... क्या बात है लाजवाब तेवर .... अच्छी लगी आपकी रचना ...

Suman Sinha said...

waah...space ke saath replace , swabhimaan hai

अजय कुमार झा said...

सन्नाट पंक्तियां

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

aap to aise shakhsiyat hain jinko koi replace karne wala nahi hai!

Harman said...

gazab !

mere blog par bhi kabhi aaiye waqt nikal kar..
Lyrics Mantra

सर्वेश दुबे said...

kuchh samajh nahi Aaya ....
thodi aur panktiya hoti to sayad mai bhi samajh jata .

ye koi coment nahi hao request hai .
bat mere jaise kam samjhdar logo ki hai .

इंदु पुरी गोस्वामी said...

एक बार वापस आदेखना जरूर
तुम्हे किसने रिप्लेस किया है? अक्सर रचनाकार खुद की और समाज की दोनों की बाते,अनुभव अपनी रचनाओं में देता है,करता है.ये रचना आपके व्यक्तिगत अनुभव हैं? यदि हाँ तो.....
एक बात बताइए प्रिय को 'स्पेस' चाहिए इसलिए आपने उसे स्वतंत्र कर दिया अपनी ओर से 'जाओ जितना चाहो स्पेस ले लो'
किन्तु आप जैसे संवेदनशील व्यक्ति ने उस 'स्पेस' को भरा,वो जानना चाहती हूँ.
मात्र भावुकता में आके उसे रिक्त रहने देना अक्लमंदी भी नही किसी 'पुरुष' के लिए.
हा हा हा स्त्री के लिए नही लिखा .सब मारेंगे मुझे सच्ची ये बात पढ़ कर.....
पर जाने कयों ये कविता एक गहरा दर्द छुपाये हुए है खुद में......और मैं दुखी.

Priya said...

इंदु पूरी जी,
आपने खुद सवाल किया और जवाब भी दे दिया.
रचनाकार से किसी भी रचना को जोड़ कर देखना उचित नहीं है, हालाँकि अक्सर ऐसा पाठक करता है.कविता बहुत तरीकों से जन्म लेती है...बहरहाल मेरी कविता में एक क्षणिक विचार को ही शब्द दिए गए हैं

डॉ .अनुराग said...

love this one.....

यहाँ तुम ज्यादा ओरिजनल हो......वैसे कभी कभी लगता है ...जैसे कई बार एडिट करके रोका है अपने आप को लिखने से

संजय भास्कर said...

क्या बात है लाजवाब तेवर .... अच्छी लगी आपकी रचना ...... बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।

संजय भास्कर said...

200 फोलोवर ...सभी ब्लोगेर साथियों और ब्लॉगस्पॉट का तहे दिल से शुक्रिया ...संजय भास्कर
नई पोस्ट पर आपका स्वागत है
धन्यवाद