Tuesday, November 23, 2010

मौजूदगी

तेरे  जाने का सबब मालूम नहीं
आने की भी वजह कहाँ थी कोई
आज बहुत याद आये तुम


सोचती रही
क्यों किया ऐसा ?
कोई गलती बताते मेरी
गुस्सा करते,
चीखते, चिल्लाते, झगड़ते
इल्ज़ाम लगाते
बिन आहट  चले गए
दबे पाँव



अलमारी खोली
फाइल निकाली
वो नन्ही सी डायरी ...
जिसमें सिर्फ एक निशानी है तुम्हारी
तुम्हारा नाम
 अपने ही हाथो से लिखा था तुमने


उन अक्षरों को बार-बार छू
तुम्हारी मौजूदगी को महसूस किया मैंने
अब इस बात पर तो कोई ऐतराज़ नहीं ना ?

14 comments:

ehsas said...

dil ke dard ko bayan karti ek sunder rachna. aabhar.

vinay vaidya said...

बहुत ’कूल’,
सरल भावाभिव्यक्ति,
स्नेह के ’यथार्थ’ की !

vandana said...

kyaa kahoon pata nahi ......lekin ek sher hai ...kuch cheese kuch yaade ..ye vo dava hai jo jahar si hai ,

रश्मि प्रभा... said...

ऐतराज़ गर है
तो आ ही जाओ
याद किया है मैंने
हिचकियाँ लेते आ जाओ

Dimps said...

Hello dear,

It is simply wow!

Regards,
Dimple

सागर said...

मेच्योर होने में हम यह सब खो बैठे... अब आगे आप लोग ही संभालिये

सम्वेदना के स्वर said...

प्रिया जी! इन्तज़ार करें, क्या पता कब वो गौतम बुद्ध होकर लौटे!!

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

straight from the heart Priya ji....i can understand the feeling...awesomely written!

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

straight from the heart I am sure! I can feel the feeling of course....keep rocking Priya jee!

mridula pradhan said...

behad komal aur sunder bhaw .

Vijay Kumar Sappatti said...

kya kahun .. do baar padh chuka hoon aur man me kuch bheeg gaya hai .. gala me kuch ruk gaya hai ..

aapko salaam

bahut sundar rachna

badhayi

vijay
kavitao ke man se ...
pls visit my blog - poemsofvijay.blogspot.com

रचना दीक्षित said...

अंतर्द्वंद को बखूबी उकेरा है. किस तरह से जीवन में घटने वाली हर छोटी बड़ी बात को सामने रखा है. बेमिसाल है

संजय भास्कर said...

वाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.
आप बहुत अच्छा लिखती हैं और गहरा भी.
बधाई.

संजय भास्कर said...

बहुत पसन्द आया
हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..