Tuesday, March 9, 2010

एहसास खोए जब






लिखने बैठे हैं कुछ आज
बहुत दिनों बाद


सोचते थे
रब्त--ख्यालों के जहाँ से
आवाज़ देंगे एहसासों को
कोई गीत, ग़ज़ल, कविता, नज़्म या रुबाई
दौड़ी चली आयगी...
हमारे दामन में बेनक़ाब हो जाएगी


लेकिन ये क्या ?
दिल--गोशा में कोई जज़्बात ही नही ,
एक सुनहरी तीरगी
और
बाआवाज़ खामोशी के सिवा
कहीं कोई अश्आर ही नही


यक़ीनन!
एहसासों , जज़्बातों की चोरी हो गयी
या फिर
हमारी
ख्यालगाह में बुरी नज़र लग गई।
मुमकिन है!
किस ने टोना किया हो
या फिर
दरबाह बद्दुआ की शिकार हो गई।


लिल्लाह!
कोई तो आए
जो
नज़र उतरे ....
इस मायूसी से हमें उबारें
हमारी क़लम में मंतर फूँके
दिल में एह्सासातों का चश्मा फूट जाए



यकायक!
इस ख्यालात से एक तस्वीर उभरी-
हमने देखा -
कविता हमारे पास नमक लिए खड़ी थी
रुबाई हाथों में राई लेकर आई थी,
ग़ज़ल मौजूद थी तीखी मिर्ची के साथ
गीत ने कुछ लकड़िया सुलगाई थी।


सर से सात बार फेर जो झोंका था आग में
खुदा कसम ज़रा भी गंध ना आई थी


अब नज़र उतर चुकी थी हमारी
क़लम की पैराहन नज़्म बन...
सफो पर छप चुकी थी


एहसासों की दुनिया का ऐसा "सहयोग"
पहली बार महसूस किया था हमने



दरबाह - कलम

21 comments:

Suman said...

nice.........................

vandana said...

by god yaaaar kyaaa solid andaaj se najar utaari tumne :-) aweeeeeeeeeeesom !
behad khoobsoooratt khyaal hai sacchi me :)

अनिल कान्त : said...

this one is superb !

रश्मि प्रभा... said...

yaa ilahi ye maazra kya hai
nazar utaarne tere dar tak hum aa pahunche to dekha
chor to tum hi ho
tabhi to aise khyaal umde....kyun?

अलीम आज़मी said...

bahut sunder rachna aapki .... really its touching priya ji keep going .....

Dimps said...

Hello,

Concept, verbiage, composition and the entire flow is WONDEFULLY FANTABULOUS!!!

I am speechless & moved & I cannot believe the way you have covered it all.

My Goodness...! You are really blessed. Wish you attain more and more insight with each composition of yours!

Mind blowing.
Regards,
Dimple

dimple said...

नज़र उतर गयी तो खूबसूरत कविता बन गयी.

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

प्रिया जी,
आपकी इस रचना के लिए मैं केवल एक ही बात कहना चाहूँगा!
कभी कभी कोई रचना इतनी अच्छी लगती है और दिल को छू जाती है, की उस रचना के बारे में कुछ कहना सूर्य को दिया दिखाने जैसा लगता है!
बस येही बात है आपकी इस रचना में, तारीफ करने के लिए शब्द नहीं है इसीलिए किसी भी आकर्षक शब्द का इस्तेमाल कर के मैं इसकी गरिमा को कम् नहीं आंकना चाहता!
खुशनसीबी है मेरी कि मुझे आपके द्वारा लिखी हुई रचनाएँ पढने का सौभाग्य प्राप्त होता है!
शुक्रिया!

दिगम्बर नासवा said...

क्या खूब लिखा है .. एहसास की दुनिया का सहयोग ... वैसे खुद का मैं ही साथ देता है हमेशा ... वरना कौन किसका साथ देता है इस दुनिया में ....

Ashish (Ashu) said...

बहुत ही अच्छी रचना

डा. श्याम गुप्त said...

सुन्दर कविता---सच है कविता एक खूबसूरत अहसास है,----
गीत भला क्या होते हैं ,
बस एक कहानी है;
भीगे मन से सच्चे मन की
व्यथा सुहानी है ।

संजय भास्कर said...

bahut sunder rachna aapki ..

शोभना चौरे said...

aisa lga mano hmari hi nazar lgi ho
kya bat hai jab kuch nhi to itna kuch hai age kya hoga allh jane .bhut hi umda rchna man khush ho gya .chor ka pta chle to khabar kijiyega ham bhi savdhan ho jayege .hahahaa

शरद कोकास said...

खूबसूरत नज़्म ।

रचना दीक्षित said...

जब नज़र लगी थी कलम को तो ये हाल है वरना क्या होता ??बेमिसाल अद्भुत और क्या कहूँ ???????????????!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

राकेश कौशिक said...

मुझे उर्दू के शब्द कुछ-कुछ ही समझ आते हैं उसी बिनाह पर लगता है रचना जी ने बिलकुल सही फ़रमाया - बेमिशाल

psingh said...

sundar post

mohnish said...

aisi najar ko najar lage
jo aapki kalam ko najar lagaye


ye jajbaaton ka ghada bhare nahi
khayalon ki seema bandhe nahi
shahyi se likhe aapke har shabd
kayanat tak bhi thame nahi

सुमन कुमार said...

मैं कवि नहीं हूँ

मैं कवि नहीं हूँ,
क्योंकि कोई भी गुण
नहीं है हमारे अन्दर
जो होता है,
एक कवि में.
न तो दिखने में ही
कवि लगता हूँ,
और कवियो वाली पोशाक भी
नहीं पहनता.
फिर भी न जाने क्यों?
ऐसा लगता है,
दिल के कोई कोने में,
छुपा है.....
मेरा कवि मन.
जो चाहता है,
मुझे कवि बनाना.
उसके अन्दर दृढ इच्छा है,
कठोर परिश्रम है,
जो बदल देगा,
मेरा बजूद.
हाँ देखना एक दिन
वह जरुर बदल देगा,
और ला खड़ा करेगा,
मुझे........
भविष्य में कभी
कवियों की लम्बी लाईन में.

सुमन कुमार said...

सोच नाथू राम गोड्स की
जीवित रहना महात्मा गांधी का,
ठीक नहीं था, देश और खुद उनके सेहद के लिए.
आज सरेआम वलात्कार की जा रही है,
उनके सपनों के भारत की,
भर्ष्टाचार के बुलडोजर से .
मिटा दी गई है,
राम राज्य की निशानी,
अतिक्रमण का नाम देकर.
नहीं देख सकते थे हकीकत,
अपने सपनों के भारत की.
सांसे रुक जाती, जब होता,
मासूमों के साथ वलात्कार.
रूह कांप उठाता देखकर,
गरीबों का नरसंहार.
पूजा करते मंदिरों में......
अनसन करते, संसद के सामने.
हो सकता है, बेचैन आत्मा,
संसद भवन के पास भटकती,
मुक्ति के इन्तजार में.
कितना आगे था, सोच
नाथू राम गोड्स की,
जो भारत का वलात्कार होने से पहले,
कर दी, पवित्र आत्मा को मुक्त,
सदा के लिए...........

सुमन कुमार said...

वह तितली

उड़ने की कोशिश में,
नाकामयाव......
उसकी पंखो को,
कुतर दी गई है,
बंदिस रूपी खंजर से.
चाहती थी वह,
उड़ना.....
अनंत तक
चहकना.....
अरमानो के मुडेर पर,
फुदकना.....
दिल की आँगन में.
स्वर्ण पिंजरा को छोड़कर,
उड़ने के लिए
खुले आकाश में.
चाहत की दरवाजे को,
पार कर जाना चाहती थी,
वह तितली.