Saturday, May 2, 2009

एक मुलाकात डॉ. कुमार विश्वास के साथ



कहते हैं कवि बनने की पहली शर्त इंसान होना हैं। कविता कवि के उन
क्षणों के उपलब्धि होती हैं, जब वो अपने आप में नही होता। इसीलिए कवि के चेतनास्तर तक उठे बिना समझी भी नही जा सकती।



आज जिनके बारे में बात करने जा रही हूँ, उन्होंने देश में ही नही वरन विदेश में भी अपनी पहचान बनाई हैं। लोग सिर्फ़ उनको सुनते ही नही बल्कि उनका अनुसरण भी करते हैं। जी हाँ वो हैं हम सबके प्यारे डॉ० कुमार विश्वास :-)




डॉ0 कुमार विश्वास का नाम किसी परिचय का मोहताज़ नहीं हैं। युवा दिलों कि धड़कन कहा जाये तो अतिशयोक्ति न होगी, वो बहुत बड़े फनकार हैं, जब अपनी कविताओ का पाठ करते हैं तो सीधे श्रोताओ कि नब्ज को टटोलते हुऐ रूह को छु लेते हैं। उनकी सीधी , सरल भाषा कविता का मार्मिक व्याख्यान ही नहीं करती बल्कि गुदगुदाती टिप्पणियां लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहट खींच देती हैं। शायद यही वजह है कि जहाँ एक तरफ आज का युवा कारपोरेट वर्ल्ड के उतार - चढाव से जूझ रहा हैं, ......... पाश्चात्य संस्कृति में रचा बसा, फिर भी हिंदी कविता को जीता हैं, सुनता हैं, सराहता हैं। आखिर कुछ तो बात हैं आज कि पीढी में .............. स्पष्ट हैं प्यार और भावना की भाषा कौन नहीं समझता। शायद यही वजह है कि डॉ0 विश्वास के जुदा अंदाज ने नई पीढी को अपनी तरफ आकर्षित किया हैं ।

कभी डॉ. विश्वास से मेरी मुलाकात होगी और उनसे मिलकर मेरे लेखन का शौक फिर से कुलांचे मारने लगेगा ..... ऐसा भी नहीं सोचा था कभी..

पर यही तो जिंदगी हैं ....हमेशा वो देती हैं जिसकी आपको उम्मीद न हो....... मेरी और उनकी मुलाकात का वाकया हैं बहुत दिलचस्प .....मेरे लिए तो वो एक अविस्मरणीय क्षण हैं .... सोचती हूँ क्यों न इस किस्से से आपको रूबरू करवाया जाये।

दरअसल डॉ0 कुमार विश्वास नाम के कोई कवि भी हैं, इसका ज्ञान करीब ढाई साल पहले ही हुआ। एक दिन परिवार के साथ टी० वी० पर कवि सम्मलेन देखा, उसमे डॉ० विश्वास को उनकी प्रसिद्ध रचना " कोई दीवाना कहता हैं ' सुनाते हुए देखा ..........कविता ने तो स्तब्ध करके रख दिया हैं ... याद हैं पापा कि वो टिपण्णी " ये शख्स बहुत आगे जायेगा,बिलकुल गोपाल दास नीरज जैसे हैं इसके तेवर " बस प्रोग्राम ख़त्म, बात ख़त्मकविता के कुछ अंश दीमाग में फीड हो गए थे तो गुनगुना लेती थी कभी कभी।

अक्सर मेरे सहकर्मी पूछते ..... ये क्या गुनगुनाती रहती हो ? मैं बस मुस्कुरा देती। एक दिन बताया अपनी सहेली की ...... उसने मजाक- मजाक में नेट सर्फिंग शुरू की और मुझे डॉ० विश्वास का -मेल आई ० डी० सर्च करके दे दिया


बात शायद जुलाई या अगस्त २००८ कि हैं जब मेरी एक सहेली ने उनका ई -मेल आई ० डी ० दिया था मुझे। मैंने भी झट से इनविटेशन भेजा और उधर से स्वीकृति भी मिल गई ........मैंने अपना परिचय दिया .......पर उन्होंने ज्यादा बात ही नहीं की। मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि उनके जैसा मसरूफ शख्स इन्टरनेट पर यूजर हो सकता हैं। मैंने उनसे काफी बात करने कि कोशिश की, पर उधर से किसी भी बात का ठीक जवाब ही नहीं आया, मैंने कहा कवि हैं तो दो - चार पंक्तिया अपनी कविता की ही लिख दे ताकि यकीन हो जाये कि आप वही हैं जिन्हें हम समझ रहे हैंI उन्होंने मेरे इस निवेदन को भी ठुकरा दिया ..... मैंने भी सोचा की कवि होकर कविता से परहेज .... यकीनन ये शख्स डॉ० विश्वास नहीं हो सकता .......ये ईमेल आई० डी० नकली हैं और कोई डॉ० साहेब का नाम इस्तेमाल करके लोगों को बेवकूफ बना रहा हैं। बस मैंने दो - चार उलटी - सीधी बातें लिख कर भेज दी । उधर से जवाब आया अगर नहीं यकीन हैं तो ब्लाक कर दीजिए । मैंने भी बिना देर लगाये तुंरत ब्लाक कर दिया.... बहुत गुस्सा आया खुद पर उस दिन कि कैसे कर बैठी इतनी बड़ी बेवकूफी।




जिंदगी अपनी रफ़्तार से चल रही थी । इस बात तो करीब चार माह बीत चुके थे । मेरे दिमाग से ये वाकया मिट चुका था ..... एक दिन फुरसत के क्षण, मैं एक सोशल वेबसाइट विजिट कर रही थी .............अचानक नज़र डॉ कुमार विश्वास नाम के प्रोफाइल पर नज़र गई, तुंरत विजिट किया प्रोफाइल ........ आश्चर्य हुआ वो तो सचमुच में कवि डॉ0 कुमार विश्वास थे ....मैंने झट से ब्लाक आई० डी० को ओपन किया । दोपहर में प्रतिक्रिया भी आई उधर से .... मैंने याद दिलाया उनको अपने बारे में और पूर्व व्यवहार के लिए माफ़ी में मांगी।


एक बार पता चला कि किसी प्रोग्राम के सिलसिले में उन्हें लखनऊ आना हैं। सोचा आ रहे हैं तो क्यों न मुलाकात की जाये , बहुत खुश थी मैं, पर थोडा सा डर भी था अंदर........ इस तरह किसी से मिली जो नहीं थी कभी ........ मैंने अपनी इस दुविधा को ऋचा (मेरी सहेली ) से बताया। हमने डिसाइड किया कि हम दोनों साथ जायेगे उनसे मिलने।


अगले दिन सुबह पता चला कि उनका प्रोग्राम तो रात का था और दिन में बजे शताब्दी से वापस दिल्ली जा रहे हैं। हम ऑफिस में थे तो छुट्टी के लिए कोई सॉलिड वजह होनी चाहिए। एच० आर० से मिलकर किसी तरह छुट्टी मिली। अब कवायत शुरू हुई कि कवि से मिलने जा रहे हैं, तो खाली हाथ तो नहीं जाना चाहिए। हम दोनों ने डिसाइड किया कि माँ सरस्वती के उपासक को क्यों वीणावादिनी ही भेंट की जाये। बस झटपट गिफ्ट शॉप से माँ सरस्वती की प्रतिमा ली और चल पड़े स्टेशन कि ओर

स्टेशन पर पहुचे तो शताब्दी प्लेटफोर्म पर खड़ी थी, ऋचा ने प्लेटफोर्म टिकेट लिया और फिर हमने रुख किया शताब्दी की ओर। हमने पता किया था कि एक्जीक्यूटिव क्लास में हैं उनका रिज़र्वेशन। निसंदेह इंटेलिजेंट तो मैं हूँ ही.............एक्जीक्यूटिव क्लास इंजन के पास होता हैं और हम चले गए विपरीत दिशा में. ...... बाई गौड.... पूरे दो चक्कर लगाये थे ट्रेन के ........ऊपर से ट्रेन बार - बार सीटी बजाकर ये बता रही थी कि स्टेशन से रुखसती का समय रहा हैं ...धड़कने बढ़ रही थी हमारी ...... कितना प्रयत्न किया था हम दोनों ने .... वो ऑफिस में बहाना बनाना..... .कम टाइम में गिफ्ट की शौपिंग ...... चिलचिलाती धूप में स्कूटी चलाकर वो स्टेशन पर पहुचना ......... ट्रेन की परिक्रमा और फिर मुलाकात हो पाना ............. आखिरकार मिल ही गए कोच के बाहर खड़े हुए थे। थके- हारे हम दोनों बेचारे पहुँच गए.... डॉ0 विश्वास के सामने ......... बहुत खुश थे हम दोनोंसोचा तो था .....कि पूरा इंटरव्यू लेंगे ....कई सवाल थे जहन में पूछने के लिए .....पर शायद उनसे मिलने कि ख़ुशी इतनी ज्यादा थी कि दिमाग से सवाल छूमंतर हो गए। वक़्त भी कम था हमारे पास ........हमने जल्दी से गिफ्ट जो जल्दबाजी में ख़रीदा था, उनके हाथ में दे दिया, अपने सामने ही खोलने को बोला ..... माँ सरस्वती कि प्रतिमा को देख कर वो भी बहुत खुश थे बोले कि मैं इसे स्टडी में रखूंगा।

उनके लिए ये घटना कोई बड़ी बात नहीं हैं। क्योकि उनके पास हमारे जैसे हजारों की भीड़ हैं। रोजाना कही न कही उनका शो रहता हैं .... और रोज़ कुछ न कुछ प्रशंसको का नाम उनके साथ जुड़ ही जाता हैं। कुछ पलों की मुलाकात से किसी के बारे में कुछ नहीं बताया जा सकता पर चूँकि आज के दौर के वो एक प्रसिद्ध कवि हैं और युवाओ में काफी लोकप्रिय भी। जब कभी उनका कोई विडियो देखती तो सोचा करती थी ..... काश ! एक बार मुलाकात जो जाए तो क्या बात हो

एक बात जिसने काफी प्रभावित किया वो ये की हमें उनसे मिलकर ऐसा लगा ही नहीं कि मैं " डॉ० कुमार विश्वास से मिल रही हूँ। बल्कि ऐसा लगा कि अपने किसी रिश्तेदार को स्टेशन पर सी- ऑफ करने आये हैं। डॉ कुमार विश्वास हमसे मिलकर प्रसन्न हुए या नही , ये तो नही जानती पर . . हमारे लिए तो कुछ ऐसा था जैसे " चाँद कि जिद करने वाले बच्चे को सच-मुच चंदा मामा ही हाथ लग गए हो"

डॉ साहेब से मुलाकात का ये अच्छा अनुभव रहा ...... जिंदगी में कुछ न कुछ बदलता रहना चाहिए वरना जीवन कि गति ही रुक जाती हैं ........रुकी हुई जिंदगी सुस्त और नीरस हो जाती हैं ........ अब मुझे इंतज़ार हैं .... जिंदगी कि एक नई खोज का ....एक और रुचिकर अनुभव का ............शायद अगली मुलाकात फिर किसी ख़ास शख्सियत से हो ......

इस छोटी से मुलाकात ने मेरे जीवन को नई दिशा दी. मेरी कलम जिसने शायद चलना ही छोड़ दिया था ... उसे गतिमान बना दिया डॉ० विश्वास ने। ऐसे प्रेरक व्यक्तित्व के प्रति ह्रदय में आदर के भाव क्यों न हो...........


विश्वास सर और उनकी कविताओं से प्रभावित होकर.......हमने भी शब्दों से खेलने की कोशिश की! इसलिए मेरी ये रचना उन्ही को समर्पित हैं .........

माँ भारती के अनन्य उपासक,
भगवती सरस्वती को काव्यांजलि अर्पित करने वाले,
आपके व्यक्तित्व से तो जग हिला हैं,
कवियों में होता न कोई छोटा, न बड़ा हैं.


नहीं चाहती कि तारीफ में कुछ शब्द कहूं मैं,
क्यों आदि युग के कवियों कि राह चलू मैं ,
आप कोई राजा या नेता नहीं हैं,
सत्ता के शिखर पर आप बैठे नहीं हैं


मुझे आपसे कोई भौतिक लालच नहीं हैं,
लेन-देन का अपना कोई रिश्ता नहीं हैं,
हम दोनों अनजान एक - दूजे से हैं,
हाल ही में जाना कि आप पारस से हैं


बस एक बार आपकी एक कविता यू ही हाथ लग गई,
हाथ क्या लगी, वो तो जैसे रोम - रोम में बस गयी,
तभी एक नए रिश्ते का सर्जन हुआ था
कवि और पाठक का नामकरण हुआ था


आप लिखते गए मैं पढ़ती गई, सुनती गई,
भूरि- भूरि प्रशंसा करती गई ,
नहीं चाहा प्रशंसा आप पर जाहिर करू मैं,
क्यों बेवजह कविता लिखूं - तारीफ करुँ मैं,


पर आपकी नज्मों और अंदाज़ - ए - बयां ने बजबूर किया हैं,
वरना हमने भी कभी वक़्त जाया नहीं किया हैं,
क्यों लिखा और सुनाया ऐसा कि रूह तक मचल गयी,
कलम थिरक गई , और मेरी लेखनी कविता में ढल गई ।


विश्वास करो मेरा , इसमें कुसूर मेरा नहीं हैं,
ये कलम निर्भय , स्वच्छंद तहरीर पर अड़ी हैं,
कुछ पलों की मुलाकात पर इसने दास्ताँ गढ़ी हैं ,
और मैं मजबूर बहुत बस इसके हुक्म पर चली हूँ ।



कुछ कम - ज्यादा होगा, तो दोष मेरा न होगा ,
मान - सम्मान का इल्जाम मुझ पर न होगा,
मैं तो बस साधन मात्र हूँ,
इसकी स्थिरता को गतिमान बनाने का पुण्य आप पर होगा।



आपके लेखन को किसी कि नज़र न लगे ,
आपको हिंदी साहित्य में नया शिखर मिले,
अंग्रजी के जाल में भटके हुओ को हिंदी साहित्य से वापस लाना,
ऐसा चुम्बकत्व तो किसी नारी के सौन्दर्य में न होगा।



कही मेरी इन बातों से गौरान्वित तो नहीं महसूस करोगे,
डरती हूँ, कही गुरूर कि सीढ़ी तो नहीं चढोगे,
गर ऐसे ही सादगी, सहजता, सहृदयता से चलते रहोगे,
देते हैं दुआ आज आपको, तूफानों को चीर कर आगे बढोगे।



इस लेख पर आप सभी की प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेग।

27 comments:

श्यामल सुमन said...

मन में हो विश्वास अगर मिल जाये विश्वास।
कर्मशील बन कर करें मुट्ठी में आकाश।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Udan Tashtari said...

डॉ कुमार विश्वास अनूठे व्यक्तित्व के धनी है और एक बेहतरीन इन्सान. मेरी खुशकिस्मति ही कहिये कि उनके साथ रुबरु होने का मौका मिला और एक छोटी सी काव्य गोष्ठी में उनके साथ पढ़ने का भी.

अति प्रभावशाली व्यक्तित्व.

इश्वर करे आपकी उनसे और मुलाकात हो. बहुत सहज इन्सान हैं, उनसे मिलना हमेशा सुखद ही होगा.

Prem Farrukhabadi said...

rachna sarahneey hain.

Navnit Nirav said...

Wakai ek adbhut anubhav raha hoga unse milna.Mujhe vishwas hai ki aapke liye ye kshan bahut hi anmol honge.Un par likhi kavita bahut pasand aayi.
Navnit Nirav

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

eemandaaree se likhaa gay sansmaran, jeevant hai.

रश्मि प्रभा... said...

डॉ विश्वास का परिचय और उनके लेखन के प्रति अपना अनुराग बहुत सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है,इसे कहते हैं लिखना.....

AlbelaKhatri.com said...

PRIYAJI,
dr.kumar vishwas k sandarbh me aapne jo likha hai voh prashansaya hai..............kumarji ko maa sharda ne aseem kala,uurja aur shabda ksampoorna samarthya se bhar diya hai, main unke aur zyada ujjval bhavishya tatha aarogya ki kamana karta hoon............wish you all the best
-albela khatri
www.albelakhatri.com

vandana said...

bahut hi lajavab mulakat or usse bhi lajavab hai tumahra vyakhyan .....mujhe khud par itrana aa raha hai ki tum or kumar vishvaas meri friend list me sabse upar ho or kitni aasani se maine tumhe pa liya .............. thank u so much

गौतम राजरिशी said...

विश्वास साब के हम भी बड़े फ़ैन हैं...उनकी ग़ज़लो के तो हैं ही और आजकल "पाखी’ में हर महीने आने वाले उनके स्तंभ ’दीवाना कहता है...’ की धूम मची हुई है।
उनकी एक "हंगामा" रदीफ़ पे ग़ज़ल है। मैं बहुत दिनों से पूरी ग़ज़ल की तलाश में हूँ। यदि आप कुछ मदद कर सकें तो मेहरबानी होगी

Divya Prakash said...

I loved the way you modestly asked for comments !!
मैं आलोक की कविता के कमेन्ट से होता हुआ यहाँ पे आ गया और जो भी अनुभव अपने yahan vyakat किये उसको देख के मुझे अ्ब लिखने का मन कर रहा है ..मुझे एक बार शताब्दी में नीरज जी(गोपाल दास नीरज ) मिल गए थे और अलीगढ तक खूब बात हुई मेरी मैंने कभी लिखा नहीं ...ये लिखा हुआ पढने के बाद में मेरा मन किया की लिखूं ... thanks for such a wonderful article that motivated me to write

Regards
दिव्य प्रकाश दुबे
http://www.youtube.com/watch?v=oIv1N9Wg_Kg

भूतनाथ said...

किसी के भी बारे में इतनी "विश्वासपूर्ण"......अनुरागपूर्ण....और भागमभागपूर्ण लिखी गयी यह अभिव्यक्ति आज दिल को जैसे छु ही गयी.....ऐसा लगा कि काश हम ही कुमार विश्वास हुए होते....सच बहुत उम्दा....गहरी....और प्रेम से सराबोर रचना.....!!.......प्रिया को विश्वास की रचनाओं का असीम प्रेम...........!!

सागर नाहर said...

डॉ विश्वास के जाल स्थल को देख कर जब मैने उन्हें मेल किया कि आपकी साईट की डिजाईन अच्छी नहीं लगी, यूनिकोड ना होने से बहुत देरी से खुलती है तो डॉ विश्वास ने बाकायदा उस मेल का जवाब दिया और साईट को सही बनाने का आश्वासन दिया।
मैने भी डॉ साहब को सुरत में सुना था तब ही से उनका फैन हूं। धन्यवाद, डॉ विश्वास से हुई मुलाकात के बारे में बताने के लिये।
एक सुझाव देना चाहता हूं आपके ब्लॉग में हरे रंग के बेकग्राऊंड पर काले फोन्ट हैं सो उन्हें पढ्ने में बड़ी परेशानी होती है , कृपया उन्हें सफेद रंग में बदल दीजिये।

॥दस्तक॥,
गीतों की महफिल,
तकनीकी दस्तक

Harsh said...

mulakaat achchi lagi...

"अर्श" said...

WAAH BAHOT HI SUNDAR CHITRAN KARA HAI AAPNE.. DR.VISHWAS SE MULAAKAAT KE LIYE BADHAAYEE AAPKO.. WO YAHI RAHTE HAI GAZIABAAD ME .. HAMAARE GHAR SE JANDIK HI HAI MAGAR AAJ TAK MULAAKAAT NAHI HO PAAYEE HAI... PATA NAHI KAB MIL PAUNGA... BADHAAYEE ISKE LIYE AAPKO..


ARSH

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत बढ़िया डॉ विश्वास के बारे में जाना उनका लिखा हुआ पढना सुनना पसंद है बहुत ..शुक्रिया

guptaricha28 said...

hmmm...yaadein taaza ho gayi...it was actually an amazing experience that is going to stay with us for a lifetime...us din ka pagalpan wakai yaadgaar tha :-)

Pyaasa Sajal said...

is vakye se bahut hadd tak relate kar paaya,aur isliye ek vistrit sa comment karna chahoonga...

Dr.Kumar Vishwas ke baare mein pehli baar pata chala jab inke ek kavi sammelan ka video(NSIT me kiya gaya) college mein mujhe mila...use dekhke bas inka fan ho gaya...kaafi follow kiya inko aur is baat ko smaajh paaya ki Hindi ki kavita bhi yuva peedhi ko deewana bana sakti hai..abhi haal mein feb mein mujhe pehli baar ek kavi sammelan mein bolne ka mauka mila tha,apne college ke yearly fest mein,jahaan maine Kumar vishwas ji ki adaa se bahut kuchh seekhne ki koshish ki..

in do ghatnaao ke beech ek badi khaas baat huyi,jiske kaaran is post se main itna jud saka hoon...haal mein mujhe IIT Kgp ke fest mein Vishwas Sir ko live sunne ka mauka mila,pehle se ye pata nahi th aki us sammelan mein kaun se kavi rahenge,is kaaran jab ye baat ek sukhad ashcharya ki tarah mere saamne aayi to mere anand ki koi seema nahi thi...wo ek behatareen pal tha mere liye,jab unko 50 feet ki doori se bolte sun meri ye haalat thi to main samajh sakta hoon unka koi prashansak unse mil le to kaisa lagega....aapko dher saari badhayee.. :)

Syed Akbar said...

एक शानदार शख्सियत से मुलाक़ात करवाने का शुक्रिया.

Priya said...

आप सभी की मिली- जुली प्रतिक्रियाओ & सुझावों के लिए शुक्रिया! ये रचना सिर्फ एक प्रशंसक का उत्साह हैं. जो उसे एक फनकार से मिलकर होता हैं. चूँकि लेखन का शौक हैं इसलिए शब्दों को गढ़ कर घटना का चित्रण करने के कोशिश की, जिसे आपने सराहा भी. जल्द ही एक और शख्सियत और उनकी काव्य रचनाओ को आपके समक्ष लाने का प्रयास करूंगी.

ek aman said...

ji bahut acha laga mere adarsh dr sahb ke bare me padna
aapko shubhkamnaye...r dhnywad

अम्बरीश अम्बुज said...

भ्रमर कोई कुमुदिनी पर मचल बैठा तो हंगामा..
हमारे दिल में कोई ख्वाब जो पल बैठा तो हंगामा..
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का..
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा...

वाकई लाजवाब हैं कुमार विश्वास जी.. facebook पर जब उनसे बात होती है तो यकीन नहीं होता कि ये वही हैं...

Neeraj Singh said...

मैंने भी जब डॉक्टर कुमार विश्वास जी को सुना था (वीडियो का जरिये) - जहां उन्होंने वो कविता 'कोई दीवाना कहता है' - तो बस हम भी दीवाने हो गए थे. कविता का कोई शौक़ तो नहीं है.. पर कुछ जादू तो था ... जो की चढ़ के बोल रहा था. बस लगा इन्टरनेट पे सर्च करने... तमाम विडियो डाउनलोड कर डाले...

एक बार उनके प्रोग्राम में जाने की तमन्ना है.. मैं बंगलोर में हूँ.. क्या कोई ऐसी सुविधा है, कि जिसके जरिये मैं रजिस्टर कर सकूं - और जब कभी उनका प्रोग्राम हो तो मेरे को पता चल जाए ईमेल या मोबाइल के जरिये...

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

inki shaayad ek kavita wo bhi hai na...

koi deewaana kehta hai koi paagal samajhta hai...

shankar chandraker said...

प्रियाजी
मुलाकात को जिस अंदाज में पिरोई हो वह तारीफे काबिल है. सचमुच में डॉ. कुमार विश्वाश अच्छे कवि हैं. उनकी कविता 'कोई दीवाना कहता है...' ने सबको दीवाना बना दिया है.

Dr.Kumar Vishvas said...

आप सब के स्नेह के लिए आभार ...

सदा said...

बहुत ही अच्‍छा परिचय दिया है आपने डा. विश्‍वास का और अपने लेखन का भी शुभकामनाएं ।

Anonymous said...

What broad daylight isn't today?